पाठकों ने पन्जाब के सुप्रसिद्ध एवं सुसम्पन्न विप्लवकारी - स्वर्गीय श्री भगवतीचरण जी का नाम सुना होगा, जिनकी २८वीं मई, १९३० को एक भयङ्कर विस्फोटक की असफल-परीक्षा में रावी के किनारे किसी जङ्गल में मृत्यु हुई थी। आपके पिता की राज्यभक्ति से प्रसन्न होकर गवर्नमेण्ट ने उन्हें 'रायसाहब' की उपाधि से विभूषित किया था; किन्तु पुत्र का आजीवन उद्देश्य तथा अटल विश्वास हिंसात्मक क्रान्ति द्वारा भारत को दासता की बेड़ी से मुक्त करना रहा यद्यपि अपनी इस धारणा का बहुत अधिक मूल्य उन्हें चुकाना पड़ा!
कहा जाता है, आपने अपनी लाखों की सम्पत्ति विप्लव के इस अनुष्ठान में स्वाहा कर दी। इस आकस्मिक मृत्यु के बहुत पूर्व ही आपकी गिरफ़्तारी के लिए वारण्ट निकल चुका था, किन्तु लाख प्रयत्न करने पर भी आप पुलिस के चङ्गुल में न आ सके और फलतः मृत्यु-पर्यन्त स्वतन्त्र रहे।
लाहौर आदि स्थानों में आपके कई मकान तथा पैतृक जायदाद थी, जो कहा जाता है, गवर्नमेण्ट ने ज़ब्त कर लिया है। श्रीमती दुर्गादेवी जी, जिनका चित्र पाठकों को अन्यत्र मिलेगा, आप ही की सहधर्मिणी हैं।
कहा जाता है, कुछ सरकारी गवाहों के बयान के अनुसार आपकी गिरफ्तारी का भी वारण्ट ही नहीं कट चुका था, पर साथ ही आपको पकड़ाने वाले के लिए एक यथेष्ट रक़म पुरस्कार-स्वरूप देने की भी घोषणा की गई थी; पर लाख प्रयत्न करने पर भी आपका पता पुलिस को न मिल सका।
सब से मनोरञ्जक बात तो यह है कि सन् १९३० में चम्बई के लैमिङ्गटन रोड 'षड्यन्त्र' (जिसमें एक अँगरेज़ सार्जेण्ट के मारने का अभियोग था) के किसी सरकारी गवाह ने कहा था कि 'शारदा देवी' नामक जिस महिला ने सर्व-प्रथम सार्जेण्ट पर गोली प्रहार किया, वह लाहौर-षड्यन्त्र केस की 'फरार' अभियुक्त यही श्रीमती दुर्गादेवी थीं और 'हरि' नामक जो ७-८ वर्षीय बालक 'शारदा' के साथ था, वह आप ही का पुत्र था।
पर न्यायाधीश के सामने, हमें यह जान कर प्रसन्न्ता हुई, पुलिसवालों की दाल गल नहीं सकी, यद्यपि यह सत्य है, कि श्रीमती दुर्गादेवी की गोद में भी एक ७-८ वर्षीय पिता-हीन बालक है।
बम्बई के इस उपहासजनक 'षड्यन्त्र' में करीब १७-१८ नवयुवक पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए थे और पुलिस की ओर से लगभग '१५० सरकारी गवाह' पेश करने की धमकियाँ दी गई थीं; किन्तु दूसरी पेशी में ही सुयोग्य न्यायाधीश महोदय ने इस निराधार 'षड्यन्त्र' का उपहास करते हुए पुलिस की जिन तीव्र शब्दों में निन्दा की थी और 'अभियुक्तों' को मुक्त करते हुए पुलिस की 'बेहूदा' हरकतों की जिन शब्दों में निन्दा की थी, वह समाचार-पत्रों के पाठकों से छिपा न होगा। फलतः मुक़दमा ही सबूत के अभाव के कारण उठा लिया गया! हमें बतलाना न होगा, देवी जी की यह प्रथम विजय हुई।
दूसरी विजय अब पाठकों के सामने है। कहा जाता है, श्रीमती दुर्गादेवी जी पिछले २ वर्षों से 'फरार' थीं, पर एकाएक वे १५ सितम्बर, १९३२ को प्रोफ़ेसर सम्पूरनसिंह टण्डन, एम० ए० (आप देहली कॉलेज में अङ्गरेज़ी के प्रोफ़ेसर थे। 'आसफ़' नाम के जिस व्यक्ति का नाम देहली तथा लाहौर षड्यन्त्र केसों में आया है, कहा जाता है वे आप ही हैं।
आपकी गिरफ्तारी के लिए देहली गवर्नमेण्ट की ओर से १५,००) रु० के पुरस्कार की घोषणा की गई थी, पर पिछले दो वर्षों से कहा जाता है, आपका पता भी नहीं चला था) के साथ अपने घर पहुँच कर पुलिस के पास आपने इस आशय का एक पत्र भेजा कि वे प्रोफ़ेसर सम्पूरनसिंह टण्डन सहित अपने ग्वालमण्डी (कूचा मिलखीराय) वाले मकान में (जिसे सरकार ने ज़ब्त कर लिया है) मौजूद है और यदि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करना चाहे, तो सहर्ष कर सकती है।
यह समाचार पाते हो पुलिस ने दल-बल सहित आपके निवास स्थान पर छापा मारा और तलाशी लेने के बाद आपको तथा प्रोफ़ेसर साहब को गिरफ्तार करके किले में भेज दिया गया।
गत २५ सितम्बर को आपका मामला सर्दार नरेन्द्रसिंह सिटी मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। पर पुलिस के पास आपके तथा प्रोफ़ेसर टण्डन के विरुद्ध यथेष्ट प्रमाण न होने के कारण मैजिस्ट्रेट महोदय ने दोनों को रिहा कर दिया। यह देवी जी की दूसरी विजय थी!
पर जैसे ही पहिले जुर्म में आप रिहा की गईं वैसे ही सी० आई० डी० वालों ने पञ्जाब गवर्नमेण्ट के चीफ़ सेक्रेटरी द्वारा हस्ताक्षरित एक फर्मान के आधार पर आपको तथा प्रोफ़ेसर टण्डन को फिर 'इमरजेन्सी पावर ऑर्डिनेन्स' के अनुसार गिरफ्तार कर लिया और फ़िलहाल आप दोनों दो महीनों के लिए नज़रबन्द करके शाही किले में रक्खे गए हैं।
हमारे एक प्रतिष्ठित सम्वाददाता ने हमें सूचित किया है कि इधर कुछ दिनों से आपको क्षय (तपेदिक़) हो जाने का सन्देह है और आप बहुत ज़्यादा कमज़ोर हो गई हैं। आपको प्रायः ज्वर बना रहता है।
यही आपका संक्षिप्त परिचय है।
[ चाँद, नवम्बर १९३२ ]
No comments:
Post a Comment