ईरान व भारतीय मुसलमानों में अन्तर
मौलवी आलिम फ़ाजिल श्री महेशप्रशाद जी, काशी
मैं ईरान गया और इसमें सन्देह नहीं कि मैं वहां बहुत ज्यादा समय तक नहीं रह सका तथापि मैं कितने दिनों रहा और जो कुछ मुसलमानों के विषय में जान सका उसी के आधार पर मैं यह बतलाना चाहता हूं कि ईरान व भारत के मुसलमानों में मुझे क्या क्या अन्तर मिला है.-
सब से पहली बात यह है कि भारतमें बहुत ही कम मुसलमान ऐसे हैं जो अपने आप को पहिले भारतीय और फिर मुसलमान कहते हैं और यह मानते हैं कि हमारे बाप दादा हिन्दू ही थे। वही मुसलमान हो गये थे। हम उन्हीं की सन्तान हैं। परन्तु ईरानी मुसलमान बड़ी प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करते हैं कि हमारे बाप-दादा पहिले पारसी थे। वही मुसलमान हो गये थे वह लोग पहले अपने आपको ईरानी और फिर मुसलमान कहते हैं और हिन्दुस्तानी मुसलमानों की भांति अपने को तुर्क व अरब की सन्तान कदापि नहीं बतलाते ।
दूसरी बात यह है कि प्राचीन ईरान की किसी किसी बात को ईरानी मुसलमान आज भी आदर के साथ मानते व मनाते हैं। यही कारण है कि नौरोज जमशेदी बहुत धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। ज्ञात रहे कि जमशेद मुसलमान नहीं था और मुसलमानी धर्म के जन्म से बहुत पहले एक बड़ा भारी बादशाह ईरान का हो चुका है।
इसी सम्बन्ध में यह भी जान लेना चाहिये कि ईरान में मुसलमान लोग आज भी वही दिन व मास मानते हैं जो पारसियों में प्रचलित थे। परन्तु उक्त प्रकार की बातों में हमारे भारतीय मुसलमान भाई जैसे हैं वह स्पष्ट ही है ।
तीसरी बात यह है कि वहां मुज़तहिद (धार्मिक गुरु) लोग दाढ़ी रखते हैं। इनके सिवा देहात के कुछ लोग दाढ़ी रखते हैं। बाकी लोग प्रायः दाढ़ी से कोसों दूर हैं।
चौथी बात यह है कि नुमान की परवाह बहुत ही कम लोग किया करते हैं। शुक्रवार को छुट्टी रहा करती है परन्तु जितनी भीड़ मैंने शुक्र के दिन भारत के अनेक स्थानों की बड़ी बड़ी मस्जिदों में देखी है उस प्रकार की भीड़ बड़ी नहीं हुआ करती ।
पांचवीं बात यह है कि भारत में यदि किसी कब्र के तोड़े जाने का प्रश्न हो तो हमारे बहुतेरे मुसलमान भाई यह समझते हैं कि ऐसा हो जाने से इस्लाम की जड़ कट जायगी। मैंने ईरान के कई स्थानों में देखा कि कब्रों के टूटने की परवाह नहीं की जाती है। सरमान में बहुत-सी कब्रें तोड़ी गई हैं और उन पर रहने के लिए मकान बन रहा है।
छठवीं मुहम्मद साहब के जन्म व मृत्यु दोनों की तिथियां सब हिजरी के हिसाब से भारत में एक ही हैं और वह रबीउलअव्वलकी १२ तारीख है। पर ईरान में जन्म तिथि १७ रबीउल अव्वल व मृत्यु की तिथि २६ सफर मानी जाती है ।
सातवीं- सारे ईरान की जनसंख्या १ करोड़ में से ९८॥ लाख के करीब मुसलमान है। इनमें ८० लाख शिया और बाकी मुसलमान शिया नहीं है। परन्तु शिया लोग धूमधाम के साथ मुहर्रम मनाया करते हैं ओर जो लोग शिया नहीं है वे उसमें भाग नहीं लिया करते और भारत में यह हाल है कि शिया के सिवा अन्य मुसलमान भी बड़े चाव से भाग लेते हैं।
आठवीं - इरान में केवल डेढ़ लाख के लगभग लोग ऐसे हैं जो मुसलमान नहीं हैं। यह यहूदी पारसी, कल्दानी व कुछ हिन्दू आदि हैं किन्तु सभों में परस्पर प्रेम भाव है। मैंने देखा कि मुसलमान लोग पारसियों व हिन्दुओं को 'अरबाब' कह कर सम्बोधन किया करते हैं जिस का अर्थ है - स्वामी, मालिक। इसके विपरीत भारत में जो दशा है उसके बतलाने की आवश्यकता ही क्या है।
नवीं - मुसलमान लोग यहां उर्दू में अरबीभाषा के बड़े बड़े शब्द ठूँस रहे हैं किन्तु ईरानी चाहते हैं कि उनकी फारसी भाषा से अरबी दूर ही रहे। यही कारण है कि फारसी के बाद अरबी नहीं बल्कि फ्रांसीसी भाषा का चलन बहुत ज्यादा है।
उक्त बातों से लोग जान सकते हैं कि ईरान के मुसलमान क्या हैं! अधिक क्या बतलाऊँ ?
[ १९२९ ]

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