Saturday, November 23, 2024

स्वतन्त्रता-पूर्व की अछूत केन्द्रित कहानियाँ : कँवल भारती


स्वतन्त्रता-पूर्व की अछूत केन्द्रित कहानियाँ 

(कँवल भारती) 



1920 से 1940 के दौरान लिखी गईं अछूत-केन्द्रित कहानियों का एक महत्वपूर्ण संकलन ‘अछूत’ नाम से प्रकाशित हुआ है। इसमें 50 कहानियां हैं, जिनमें परिशिष्ट में 11 रचनाएँ भी शामिल हैं। संपादक ने ‘क्या एक दिन नई सुबह होगी’ शीर्षक से ऐतिहासिक महत्व की भूमिका लिखी है, जो अछूत समस्या पर एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है। 

हिंदी में लगभग अस्सी के दशक में जब मुख्यधारा में दलित साहित्य ने अपनी दस्तक दी, और नब्बे के दशक तक आते-आते उसने जबर्दस्त जोर पकड़ा, तो प्रतिष्ठित गैर-दलित लेखकों ने दलित साहित्य के विरोध में इस तरह के प्रश्न उठाने शुरू कर दिए थे कि क्या दलित साहित्य लिखने के लिए दलित होना ज़रूरी है? या, जो दलित नहीं है, क्या वह दलित साहित्य नहीं लिख सकता? उसी समय सहानुभूति और स्वानुभूति के प्रश्न भी चर्चा के केंद्र में आए। दलित लेखकों का उत्तर था कि दलित साहित्य लिखने के लिए दलित होना बिलकुल ज़रूरी नहीं है। किन्तु प्रश्न यह है कि अब तक लिखा क्यों नहीं गया? हिंदी में उनके लिए दलित साहित्य लिखने वाले एकमात्र उदाहरण प्रेमचन्द थे। किन्तु अगर सुजीतकुमार सिंह की ‘अछूत’ कहानियों का यह संकलन अस्सी-नब्बे के दशक में छप गया होता, तो प्रेमचन्द की श्रेणी में दलित-समस्या पर लिखने वाले कुछ और लेखक भी ज़रूर जुड़ जाते। 

संकलित कहानियों पर चर्चा करने से पूर्व उनके काल-खंड को समझना ज़रूरी है। यह काल-खंड स्वतन्त्रता-संग्राम आन्दोलन का है। उल्लेखनीय है कि 1927 में इलाहाबाद की ‘चाँद’ पत्रिका ने ‘अछूत अंक’ निकाला था। ऐसा कौन सा दबाव था, जो चाँद को अछूत अंक निकालना पड़ा? कारण दो थे, एक हिन्दुओं के अत्याचारों से मुक्ति के लिए अछूतों का बड़ी संख्या में ईसाई और इस्लाम धर्मों में धर्मांतरण हो रहा था। और, दो, महाराष्ट्र में डा. आंबेडकर और उत्तर भारत में स्वामी अछूतानंद के पृथक अछूत आंदोलनों ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी हिन्दुओं के स्वतन्त्रता की लड़ाई के लिए चुनौती खड़ी कर दी थी। उन्होंने अपने अलग अधिकारों के लिए, और ख़ास तौर से राजनीतिक अधिकारों के लिए, सीधी लड़ाई शुरू कर दी थी। 1930 के दशक में अछूत आंदोलनों का प्रभाव इतना व्यापक हो गया था कि उसने हिन्दुओं के राष्ट्रीय आन्दोलन को ही नहीं, भगत सिंह तक को विचलित कर दिया था, और उसकी गूँज सात समन्दर पार लन्दन तक पहुँच गई थी। यह इसी का परिणाम था कि भारत को सत्ता सौंपने और नया संविधान बनाने के ध्येय से भारत की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए ब्रिटिश सरकार को साइमन कमीशन की नियुक्ति करनी पड़ी थी। इस कमीशन का हिन्दुओं ने बहिष्कार किया था। लेकिन पूरे देश में दलितों ने स्वागत किया था, और उसे अपनी वास्तविक दशा से अवगत कराया था। स्वामी अछूतानन्द के नेतृत्व में लखनऊ में भारी संख्या में अछूतों ने साइमन कमीशन का भव्य स्वागत किया था। इसके बाद लंदन में गोलमेज सम्मलेन हुआ, जिसमें डा. आंबेडकर ने अंग्रेज़ सरकार को ज्ञापन दिया कि भारत का दलित वर्ग वह समुदाय है, जिसे हिन्दुओं ने हज़ारों साल से सभी मानवीय अधिकारों से वंचित करके अछूत बनाकर रखा है। अगर अंग्रेज़ों ने भारत को स्वतंत्र किया और सत्ता हिन्दुओं को सौंपी, तो अछूतों को कुछ नहीं मिलने वाला। वे हिन्दुओं के राज में उसी तरह अछूत और ग़ुलाम बने रहेंगे, जिस तरह वे आज बने हुए हैं। आंबेडकर ने मांग की कि वे हिन्दू नहीं हैं, और न उन्हें हिन्दू माना जाता है; इसलिए उन्हें हिन्दुओं और मुसलमानों की तरह अलग अधिकार चाहिए। इसके बाद कांग्रेस के हिन्दू राष्ट्रवादियों में भूकम्प आ गया। रातोंरात हिन्दू मीडिया ने कांग्रेस और गांधी को अछूतों का नायक और मसीहा बना दिया। ‘हरिजन सेवक संघ’ खड़ा हो गया, जिसका अध्यक्ष किसी दलित को नहीं, घनश्याम दास बिरला को बनाया गया। हरिजन अख़बार निकलने लगा। शुद्धि आन्दोलन शुरू हो गया। हिन्दू महासभा और आर्यसमाज के नेताओं ने हिन्दुओं की नहीं, बल्कि अछूतों की शुद्धि का स्वांग रचाना शुरू कर दिया। हिन्दू कवियों ने अछूतों की प्रशंसा में कविताएँ, कहानियां और लेख लिखने शुरू कर दिए। और इस सारे अभियान का उद्देश्य अछूतों को हिन्दू धर्म और गाँधी-कांग्रेस से जोड़ने के सिवा कुछ नहीं था, ताकि वे धर्मान्तरण करके ईसाईयों और मुसलमानों की संख्या न बढ़ाएं। ‘चाँद’ का अछूत अंक इसी उद्देश्य से निकाला गया था। इस अंक में किसी दलित नायक का नहीं, पर अछूतों के उद्धारक के रूप में सी. ऍफ़. एंड्रूज़, स्वामी श्रद्धानंद, योगीश्वर गांधी, देवी सरोजिनी का ज़िक्र है, साथ ही ईसाई और मुसलमान बन गए अछूतों के चित्र हैं। इसमें दलितों के किसी नायक का कोई उल्लेख नहीं है। 

 ‘अछूत’ में संकलित कहानियां भी उसी राष्ट्रवादी युग की हैं, और उसी गांधीवादी अभियान के दबाव का हिस्सा हैं। आइए, देखते हैं, इन कहानियोँ में अछूत समस्या को किस दृष्टि से देखा गया था? इनमें 11 कहानियाँ ‘अछूत’ शीर्षक से हैं, जिनमें पहली कहानी ‘अछूत’ के लेखक श्री उग्र हैं। इनका पूरा नाम नहीं दिया गया है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह बेचन शर्मा उग्र थे या कोई और? अधिकांश कहानियों के केंद्र में अछूत पात्र चमार है, और चमार के बारे में लगभग सभी कथाकारों की यही रूढ़ धारणा है कि चमार वह है, जो चमड़े का काम करता है। 

 उग्र जी की कहानी में ब्राह्मण देवर्षिदत्त के विशाल गृह के सामने रामू चमार की झोंपड़ी है। वह जूता सीने का काम करता है। उसका सात वर्ष का पुत्र किसुन और ब्राह्मण की पांच वर्षीय पुत्री सुभद्रा बाहर मैदान में साथ-साथ खेल रहे हैं। दूल्हा-दुल्हन का खेल खेलने के लिए सुभद्रा अपने घर से मिट्टी का घोड़ा लेने जाती है, ताकि किसुन उस पर दूल्हा बनकर बैठ सके। बहुत देर तक जब वह नहीं लौटती है, तो किसुन उसे देखने ब्राह्मण के घर जाता है। उसने बगीचे से फूल तोड़ लिए हैं, जिन्हें वह दूल्हा बनकर अपने सर पर रखना चाहता है। पर वह जैसे ही ब्राह्मण की दहलीज पर पहुँचता है, ब्राह्मण उसे देख लेता है और उसे लात मारकर भगा देता है—‘चमार ससुरे, अब फिर कभी दिखाई पड़ा तो जान ले लूँगा।’ इस घटना के बाद किसुन पलायन कर जाता है। उसके ग़म में उसकी माँ भी मर जाती है। ब्राह्मण रामू का झोंपड़ा बलपूर्वक हटाना चाहता है। सुभद्रा आठ वर्ष की हो जाती है, और उसकी शादी हो जाती है। शादी से एक दिन पहले रामू के झोंपड़े में आग लगा दी जाती है, जिसमें रामू भी जलकर मर जाता है। इसके बारह साल बाद कोई दरोगा रामू की हत्या में ब्राह्मण को गिरफ्तार कर लेता है। मामला अदालत में जाता है। जज कोई जैक्सन है, जिसे लेखक ने अपनी घृणा-वश म्लेच्छ लिखा है। ब्राह्मण देवर्षि जज के पैरों में गिर जाता है, उसका मस्तक उसके जूतों को चूमने लगता है। तभी जज कहता है, मुझे पहचाना? मैं वही किसुन हूँ, मैं आपकी लात अभी तक भूला नहीं हूँ। ब्राह्मण की कंपकंपी छूट जाती है। अंत में जज जैक्सन के रूप में किसुन ब्राह्मण को दोष-मुक्त कर देता है। ब्राह्मण की रक्षा चमार की कृपा से हो गई। यह कहानी का अंत है।

 दूसरी ‘अछूत’ कहानी के लेखक कृष्णानंद गुप्त हैं। इस कहानी में कड़ाके की ठंड में सड़क पर चल रहे चतुर्भुज शर्मा को आवाज़ सुनाई देती है, बाबू जी। वह पीछे मुड़कर देखते हैं, फटे चिथड़ों में एक भिखारी गठरी बना पड़ा है। वह उस पर दया दिखाते हुए जेब से चवन्नी निकालकर फेंक देते हैं। भिखारी में इतनी ताकत नहीं कि चवन्नी उठा ले। वह कहता है, बाबू जी मुझे थोड़ा सहारा देकर उस दूकान तक पहुंचा दीजिए। वहां भट्टी जल रही है। चतुर्भुज शर्मा में दया आई। उन्होंने उसे उठाने के लिए उसके कपड़ों को छुआ ही था कि वह बोला, बाबू जी मैं भंगी हूँ। शर्मा जी पीछे हट गए। चवन्नी वहीँ पड़ी रही, और वह गठरी बना भिखारी भी। 

 तीसरी ‘अछूत’ कहानी ऑक्सफ़ोर्ड (इंग्लैंड) के कामताप्रसाद सागरीय की रचना है। कहानी में किसी पात्र का नाम नहीं है। कहानी बस इतनी सी है कि प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर चन्द्र ग्रहण स्नान होने के कारण काफी भीड़ है। मन्दिर से कुछ दूरी पर एक अछूत खड़ा है, जो मन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकता। इसी समय एक युवक और युवती हताश होकर पत्थर पर बैठ जाते हैं। उन्हें देर से आने से किसी धर्मशाला में जगह नहीं मिली है। ठंड का मौसम है। तभी टन-टन की आवाज़ करता हुआ वह अछूत उनके पास आता है। उसके गले में एक घंटी बंधी है, जो टन-टन की आवाज़ करती है। उस आवाज़ को सुनकर ‘अछूत-अछूत’ का शोर मच जाता है, और लोग उसे रास्ता देकर खुद रास्ते से हट जाते हैं। वह अछूत उन युवक-युवती को अपनी झोंपड़ी में ले जाकर उनके रहने की व्यवस्था कर देता है, और स्वयं यह सोचता हुआ कि वह भले अछूत है, पर परमेश्वर की दृष्टि में नहीं, गंगा में कूद जाता है और उसी में समा जाता है।

 चौथी ‘अछूत’ कहानी के रचनाकार रामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव हैं। यह एक अछूत कन्या रूपा की कहानी है, जो बहुत खूबसूरत है और आसपास के लोग उसे वासना की निगाह से देखते हैं, पर अछूत होने के नाते उससे छूत भी करते हैं। यह कहानी आत्मकथ्य की शैली में लिखी गई है। सिर्फ एक जगह नायक का नाम आया है ज्ञानू, जो एक विद्यार्थी है। रूपा उसके घर साफ़-सफाई का काम करती है। ज्ञानू उसे पसंद करता है। एक दिन घर में लिपाई करते हुए रूपा के हाथ से घड़े और बर्तन छू जाते हैं। इस ग़लती पर ज्ञानू की माँ उसे लकड़ी फेंक कर मारती है, जो उसके पैर में लगती है और खून बहने लगता है। ज्ञानू को उसकी माँ का इस तरह मारना बुरा लगता है, पर वह असहाय है। घड़े फेंक दिए जाते हैं और बर्तनों को आग में तपाकर शुद्ध कर लिया जाता है। यह भी अजीब पाखंड है कि अछूत द्वारा घर में साफ़-सफाई करने से घर शुद्ध रहता है, लेकिन बर्तन अशुद्ध हो जाते हैं। रूपा अपने अछूतपन और अपनी ग़रीबी को पिछले जन्म के कर्म का फल मानती है, जो हिन्दुओं का भी विश्वास है, इसलिए कहानी में भी उसका कोई खंडन नहीं है। लेकिन ज्ञानू रूपा को चाहने लगा है और मन से चाहता है, इसमें कहानी में कोई संदेह नहीं है। रूपा का पिता जब बीमार पड़ता है, तो ज्ञानू न सिर्फ उसकी आर्थिक मदद करता है, बल्कि उसकी बस्ती में जाकर उसका हाल-चाल भी लेता है। वह आसपास के लोगों से भी रूपा के पिता की बीमारी में कुछ मदद करने को कहता है, और उसके कहने पर दो-चार लोग कुछ पैसे ‘फेंकते’ भी देते हैं। यहाँ पैसे फेंकने का प्रयोग कहानीकार ने अछूतों के प्रति घृणा के अर्थ में किया है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। रूपा का पिता ठीक हो जाता है। उसके कुछ समय बाद शहर में हैजा फ़ैल जाता है। लोग शहर छोड़कर जाने लगते हैं। ज्ञानू की माँ भी बनारस जाने का निश्चय करती है। पर जाने से पहले ही ज्ञानू की माँ को भी क़ै-दस्त शुरू हो जाते हैं। कोई मदद को नहीं है। कोई रिश्तेदार तक सहायता के लिए नहीं आता। अंतत: ज्ञानू ने रूपा की मदद के लिए माँ को तैयार किया। ऐसी स्थिति में माँ भी छुआछूत भूलकर रूपा की मदद लेने के लिए हाँ कह देती है। रूपा आकर माँ की सेवा करती है, उसके क़ै-दस्त साफ़ करती है, और इस तरह वह दवाई और सेवा से ठीक हो जाती है। उसके बाद ज्ञानू को हैजा हो जाता है। रूपा ज्ञानू की भी सेवा करती है। वह भी दवा और सेवा से ठीक हो जाता है। पर हैजे के मरीज़ों के बीच रहकर रूपा कैसे बच पाती? उसे भी हैजा हो जाता है। ज्ञानू डाक्टर को बुलाकर उसे दवा दिलवाता है। पर रूपा को कोई लाभ नहीं होता और उसके नेत्र सदा के लिए बंद हो जाते हैं। ज्ञानू के लिए सारा संसार अंधकारमय हो जाता है। वह रूपा की मृतक देह पर हाथ रखकर जीवन-पर्यन्त अविवाहित रहने और अछूतोद्धार में तन-मन अर्पण करने की शपथ खाता है। 

 इन चार कहानियों में पहली कहानी में तो ब्राह्मण-चेतना ही है, जिसमें अछूत के प्रति रत्ती-भर सहानुभूति नहीं है। दूसरी कहानी में अछूत के प्रति घृणा और तिरस्कार का चित्रण है, जिसमें शर्माजी बूढ़े को चवन्नी फेंककर एक ओर अपने दयालु होने का प्रदर्शन करते हैं, तो दूसरी ओर, जब बूढ़ा अपने को भंगी बताता है, तो शर्माजी तुरंत पीछे भी हट जाते हैं। यह एक जबरदस्ती की लिखी गयी कहानी है, जिसका कथानक ही अस्वाभाविक है। बूढ़े में चलने-फिरने की शक्ति नहीं है। वह शर्मा जी से कहता है कि उसे उठाकर सामने की दुकान तक पहुंचा दो। जब शर्माजी उसको उठाने को हाथ लगाते हैं, तो तुरंत बूढ़े के मुंह से यह कहलवा देना कि वह भंगी है, कहानी को अस्वाभाविक बना देता है। प्रथम तो उस दौर में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कोई अछूत किसी राहगीर से अपने को सहारा देकर उठाने के लिए कहेगा, और अगर कोई व्यक्ति बिना जाति पूछे, उसे सहारा दे भी रहा है, तो वह उस वक़्त अपनी जाति बताने की मूर्खता क्यों करेगा? तीसरी कहानी तो किसी भी कोण से विश्वसनीय नहीं है। त्रिवेणी संगम पर किसी अछूत का एक सवर्ण तीर्थ यात्री को रहने के लिए अपनी झोंपड़ी देना, और स्वयं गंगा में डूबकर मर जाना एकदम बकवास की बात है। कोई सवर्ण जाति का व्यक्ति, जिसे भले ही धर्मशाला में जगह न मिली हो, फुटपाथ पर रह लेगा, पर किसी अछूत की झोंपड़ी में कभी नहीं रहेगा। जिस दौर में मदनमोहन मालवीय जैसे सुधारक तक एक अछूत से गले में फूलों की माला पहनने के बाद कपड़ों सहित स्नान करके अपनी शुद्धि करते थे, उस दौर में कोई सवर्ण किसी अछूत के घर में रहेगा, यह सोचना ही अकल्पनीय है। 

 लेकिन चौथी कहानी में ज्ञानू के रूप में जिस सवर्ण पात्र का आदर्श गढ़ा गया है, वह प्रभावित करता है। यह कहानी एक अछूत कन्या रूपा की संवेदना और मानवीयता को तो गहराई से अनुभव कराती है, और ज्ञानू की सहानुभूति को भी, लेकिन उसे बनाकर सेविका ही रखा जाता है, और सवर्णों की सेवा करते हुए ही उसकी मौत भी होती है। इसे अछूत-समस्या की कहानी कैसे कहा जा सकता है? 

[2]

अन्य कुछ कहानियां भी देखते हैं। पांचवीं ‘अछूत’ कहानी के लेखक अल्मोड़ा के तारादत्त उप्रेती हैं। यह एक ज़मींदार परिवार की स्त्री प्रभावती की अछूत के प्रति मानवीय होने की कहानी है। वह मंदिर के सामने ज़मीन पर गिरी बूढ़ी अछूत महिला सुखिया को उठाकर उसका सिर गोद में रखकर घाव धोती है, और अपनी साड़ी का छोर फाड़कर सिर पर पट्टी बांधती है। सुखिया मंदिर में अपने बीमार बच्चे के लिए पूजा करने के लिए गई थी, पर मंदिर में घुसने से पहले ही वह सवर्णों की हिंसा का शिकार हो जाती है। उसका सिर फट जाता है और वह नीचे गिर जाती है। प्रभावती उसके बच्चे का भी इलाज़ कराती है, यहाँ तक कि वह सुखिया और उसके बच्चे को अपने घर में रखकर इलाज़ कराती है। जो वैद्य छूत के डर से सुखिया के घर नहीं जाता था, वह प्रभावती के घर ख़ुशी-ख़ुशी जाकर अछूत बच्चे का इलाज़ करता है। कहानी में अचानक सभी का हृदय-परिवर्तन हो जाता है, ऐसा परिवर्तन कि कथाकार कहता है, ‘उस गाँव में अब छुआछूत का नामोनिशान भी नहीं है, और जिस मंदिर में सुखिया की दुर्गति हुई, वह अब समस्त हिन्दू मात्र के लिए ख़ुला रहता है। इस कहानी में मन्दिर-प्रवेश को अछूत-समस्या बताया गया है।  

 छठी ‘अछूत’ कहानी डाक्टर धनीराम प्रेम की है। यह 1932 की कहानी है, जब डा. आंबेडकर और स्वामी अछूतानन्द के नेतृत्व में दलितों का संघर्ष अपने निर्णायक स्वरूप में था, जिसके केंद्र में प्रमुख रूप से शिक्षा, सरकारी नौकरियां और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग थी। इसलिए इस कहानी में काफी हद तक दलित-चेतना के स्वर दिखाई भी देते हैं। यह कहानी एक ब्राह्मण गायक श्याम लाल और उसके गायन पर मुग्ध एक चमार बालिका गंगा की है। इसमें सहानुभूति की भले ही एक आदर्शवादी कल्पना है, पर वह प्रभावित करती है। रायसाहब के घर कोई कार्यक्रम है, जिसमें उन्होंने श्यामलाल को बुलाया है। श्यामलाल उस कार्यक्रम में एक गाना गाता है : ‘एक पिता की सब संतान/ कोई बड़ा न छोटा हममें, सब हैं एक समान।’ राय साहब के घर के पास ही कुछ मड़इयां चमारों की हैं। उसी एक मड़ई में गंगा रहती है। वह बाहर खड़े होकर उस आवाज़ को सुनती है, और वह गाना उसे इतना अच्छा लगता है कि वह एक फूल लेकर श्यामलाल को भेंट करने जाती है। श्यामलाल फूल लेकर उससे पूछता है, तुमने बाहर से गाना सुना, अंदर क्यों नहीं आईं? गंगा कहती है कि मैं भीतर कैसे आ सकती थी, ‘मैं तो चमारी हूँ, अछूत हूँ।’ यह सुनते ही श्यामलाल क्रोधित होकर फूल ज़मीन पर फेंक देता है, और कहता है, ‘चमार की बच्ची, पहले ही क्यों न कह दिया?’ गंगा फेंके गए फूल को उठाकर कहती है, ‘मैं जानती थी कि आप भी ऐसे ही होंगे। वह एकता और समानता का राग केवल महफ़िल के लिए ही था? मैं समझती थी कि आप ही संसार में ऐसे हैं, जो ऊंचनीच का भेद नहीं मानते।’ तब श्यामलाल को ज्ञान होता है कि जिसे वह सिर्फ एक गाना समझते थे, उसका अर्थ सिर्फ इस अछूत लड़की ने समझा। वह अपनी ग़लती पर पछताता है और गंगा के साथ संवाद जारी रखता है। गंगा उसके हर प्रश्न का परिपक्व उत्तर देती है। श्यामलाल पूछता है, ‘क्या तुम पढ़ना चाहती हो?’ उसके ‘हाँ’ बोलने पर श्यामलाल उसे अपने घर ले जाता है। वहां गाँव वाले उसका बहिष्कार कर देते हैं। जिस लड़की से उसका बचपन में लग्न हुआ था, उसके पिता भी रिश्ता तोड़ देते हैं। गंगा भी पढ़ना-लिखना सीख गई है। अंतत: श्यामलाल गंगा से ही विवाह कर लेता है। यह वास्तव में उस दौर में एक नए विमर्श की कहानी रही होगी, जिसने दलित शिक्षा और अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित किया था।

 सातवीं ‘अछूत’ कहानी के रचनाकार इन्द्रनारायण झा ‘इंद्र’ हैं। यह धर्मांतरण के विरोध में लिखी गई कहानी है। कहानी के अनुसार, मक्खन चमार है, पर साफ़-सुथरा रहने के बावजूद हिन्दू उससे छूत करते हैं। वह भगवान और भगवान की इच्छा में परम आस्था रखता है। इसलिए अपने अछूतपन को भी भगवान की इच्छा समझकर आनन्द अनुभव करता है। वह मन्दिर में नहीं घुस सकता, पर मन्दिर के द्वार पर ही धूल में लेटकर मूर्ति को साष्टांग दंडवत कर अपनी भक्ति प्रदर्शित कर देता है। एक दिन मंदिर में प्रसाद मांगने पर पुजारी उसका अपमान करता है। मक्खन के गाँव का ज़मींदार बाबू हरिकृष्ण कृष्ण-जन्माष्टमी के दिन मन्दिर में वेश्या का नृत्य कराता है, जिसे देखकर वह विचलित हो जाता है। उसे एहसास होता है कि वह वेश्या से भी नीच समझा जाता है। गाँव में ईसाई मिशनरी मक्खन को समझाते हैं कि देखो, इस हिन्दू समाज में तुम्हें अपमान के सिवा कुछ नहीं मिलेगा। तुम ईशू की शरण में आ जाओ, वहां सबको समान स्थान मिलता है। पहले तो वह मना करता है, पर बाद में ईसाई बनने के लिए तैयार हो जाता है। जब यह खबर गाँव में फैलती है कि मक्खन ईसाई बनेगा, तो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष केशव देव को काठ मार जाता हैं। वह मक्खन के घर जाकर उसे समझाते हैं, भगवान ने धर्म-परिवर्तन का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि अपने धर्म में मरना भी अच्छा, पर दूसरा धर्म भयावह है। और भगवान में विश्वास करने वाला मक्खन ईसाई बनने का इरादा बदल देता है। उसे एक स्कूल में चपरासी बना दिया जाता है। एक दिन पुजारी का बेटा स्कूल से आते समय धूप में गर्मी से बेहोश होकर ज़मीन पर गिर जाता है। सारे छात्र उसे यूं ही छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, पर मक्खन उसे उठाकर छाँव में लिटाकर उस पर पानी की छींटें मारता है और उसे होश आ जाता है। पुजारी को जब पता चलता है कि मक्खन ने उसके बेटे की जान बचाई है, तो उसका हृदय-परिवर्तन हो जाता है, और वह मक्खन को गले लगा लेता है। यह अछूत की हिन्दू पहचान बनाने की कहानी है। 

 आठवीं ‘अछूत’ कहानी कुमारी जगदम्बा माथुर की रचना है। यह मेहतर का काम करने वाले परिवार की कहानी है। मार्मिक स्थिति है कि अस्पताल में एक अछूत को दवाई लेने के लिए भीड़ ख़त्म होने का इंतज़ार करना पड़ता है। डाक्टर मरीज़ को छूते नहीं थे, दूर से हाल पूछकर दवाई लिख कर परचा नीचे फेंक देते थे। दवाई के काउंटर पर दवाई लेने के लिए भी अछूत को दूर से कम्पोडर पर्चा दिखाना पड़ता था। कहानी में सुखिया का बच्चा बीमार है। वह दवाई लेने अस्पताल जाती है। उसे कोई भीड़ में घुसने नहीं देता है। दो घंटे इंतजार करने के बाद जब भीड़ खत्म होती है, तब वह डाक्टर को हाल बताती है। वह दवाई लिखता है, और किसी तरह वह दवाई लेकर घर जाकर बच्चे को दवाई देती है। तब तक बहुत देर हो जाती है, बच्चे की हालत और बिगड़ जाती है। अस्पताल की दवाई कोई असर नहीं करती। सुखिया की बहन, जो पास में ही रहती थी, बच्चे को ‘अछूत औषधालय’ में दिखाने की सलाह देती है। वह अस्पताल शायद ईसाई मिशन का है। सुखिया का पति अछूत औषधालय से जब डाक्टर को बुलाकर लाता है, तब तक बच्चे की साँसें थम चुकी होती हैं। यह कहानी उस हिन्दू परिवेश को रेखांकित करती है कि जिसमें दलित जातियों रहना पड़ता था।

 नौवीं ‘अछूत’ कहानी के लेखक कालीचरण चटर्जी हैं। इस कहानी में कलार जाति की एक लड़की है कोकिला, परित्यक्ता और उपेक्षिता। एक ठाकुर कप्तान सिंह हैं, जिनकी पत्नी एक बच्चे को जन्म देने के बाद चल बसी हैं। कोकिला उसे पालने के लिए कप्तान सिंह से आग्रह करती है। स्वीकृति मिलने पर वह बच्चे को गोद में उठाकर घर ले जाती है। यह बात जब गाँव वालों को पता चलती है, तो वे उसका बहिष्कार कर देते हैं, और उसे प्रायश्चित करने को कहते हैं। वह प्रायश्चित करने को मना कर देता है। कोकिला, यह सोचकर कि उसी के कारण कप्तान सिंह का हुक्का-पानी बंद हुआ है, उस बच्चे को वापस दे देती है। इस विषय पर दोनों के बीच कुछ कहा-सुनी भी होती है। कप्तान सिंह भी अब बाक़ायदे प्रायश्चित कर लेता है। बच्चा अब बड़ा हो जाता है, स्कूल जाने लगता है। कोकिला उससे अब भी प्यार करती है और रोज़ उसे आते-जाते देखती है। फिर एक नाटकीय तरीक़े से बच्चा भी रोज़ कोकिला के घर जाने लगता है, और उसे अम्मा कहने लगता है। जब कप्तान सिंह को मालूम होता है, तो वह एक दिन कोकिला के घर से ज़बरदस्ती बच्चे को डांटते हुए ले आता है। बच्चे की ममता में कोकिला बीमार पड़ जाती है। अंत में कप्तान सिंह भी बच्चे को लेकर कोकिला की देखने जाता है। कोकिला बच्चे की आवाज़ सुनकर उठकर देखती है, और उसी समय मर जाती है। यह कहानी एक परित्यक्ता और उपेक्षिता स्त्री की ममता को रेखांकित करती है, लेकिन पूरी कहानी में उसे अछूत नहीं लिखा गया है।

 दसवीं ‘अछूत’ कहानी मंगलदेव शर्मा की है। इसमें रमुआ चमार गाँव के लाला सुखराम के घर नौकर है। उससे पहले उसका बाप झबुआ नौकर था। झबुआ मरा तो उसकी जगह उसके बेटे रमुआ ने ले ली। दलितों के नाम लगभग सभी कथाकारों ने बिगाड़कर ही लिखे हैं, यहाँ तक कि प्रेमचन्द ने भी। गाँव में ठाकुर मनोहर सिंह हैं, जो अंग्रेज़ साहबानों की बहुत ख़िदमत करते हैं। पर इस बात का भी ख़याल रखते हैं कि गाँव में कोई भी, ख़ासकर नीची जातियों के लोग शास्त्र-विरुद्ध आचरण न करें। एक दिन रमुआ अपने घर सत्यनारायण की कथा करवाता है। ठाकुर उसके विरुद्ध पंचायत बिठा देता है, जिसमें रमुआ को दंड देने का निर्णय लिया जाता है। लाला भी रमुआ को नौकरी से निकालने को राज़ी हो जाता है। लेकिन सारे चमार रमुआ के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। रमुआ भी दुखी होकर गाँव छोड़ने का फ़ैसला करता है। पर उसी रात गाँव में लाला के घर डकैत घुस जाते हैं। गोलियों की आवाज़ सुनकर रमुआ डकैतों से भिड़ने चला जाता है और वही डाकुओं की गोली लगने से ढेर हो जाता है। यह कहानी भी चमार की हिन्दू पहचान और उच्च जातियों के रक्षक के रूप में कायम करती है।

 ‘अछूत’ शीर्षक से लिखी गई अंतिम और ग्यारहवीं कहानी के रचयिता गोवर्धनदास गुप्त हैं। यह अछूत की गरिमा को नहीं, बल्कि ब्राह्मण की गरिमा और उच्चता को प्रतिष्ठित करती है। इसमें दारोगा मि. जौन हैं, जो चमार से धर्मान्तरित ईसाई है। एक किशोरी रमन शर्मा हैं, जिसके बेटे रामनिरंजन को दारोगा ने आवारागर्दी में गिरफ्तार किया है। किशोरी रमन शर्मा अपने बेटे को छुड़ाने के लिए थाने में फ़रियाद लेकर जाता है। जौन उसे पहचान लेता है कि यह वही शर्मा है, जिसने उसकी ज़मीन हथियाने के लिए उसकी झोंपड़ी में आग लगवाई थी, जिसमें वह झुलस गया था, और माँ ने बड़े मुश्किलों से गुज़रकर एक ईसाई के घर में शरण लेकर उसकी मदद से उसका इलाज कराया था। फिर माँ ने भी ईसाई धर्म अपना लिया था। पिता पहले ही चल बसे थे। माँ ने उसे पढ़ाया और वह दारोगा बन गया। वही किशोरी रमन शर्मा अब जौन के पाँव पकड़ कर अपने बेटे को छोड़ देने की विनती करता है। पहले तो जौन इंकार करके उसे वापस लौटा देता है। किन्तु बाद में वह यह सोचकर कि ईसाई बदला नहीं लेते, रामनिरंजन को यह कहकर छोड़ देता है, ‘जाओ, तुम ब्राह्मण हो, तुम्हें अपने ब्राह्मणत्व की रक्षा करनी चाहिए।’ 

  ‘अछूत’ शीर्षक से लिखी गईं उपर्युक्त सभी कहानियां दलित जातियों की हिन्दू पहचान रेखांकित करती हैं, लेकिन हिन्दू के रूप में उनके अधिकारों को स्वीकार नहीं करती हैं। 

[3]

यद्यपि, अन्य कहानियां भी अस्पृश्यता और मन्दिर-प्रवेश, इन्हीं दो विषयों पर केन्द्रित हैं, पर कुछ कहानियों में बेगार जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं, जो एक प्रमुख अछूत-समस्या थी। इन कहानियों में प्रतापनारायण श्रीवास्तव की ‘प्रतिशोध’ , देवीप्रसाद शर्मा की ‘अछूतोद्धार’ , चंद्रशेखर शास्त्री की ‘चमार की बिटिया’ , उमा नेहरू की ‘धर्म-अधर्म’ और प्रेमचन्द की ‘मन्दिर’ उल्लेखनीय हैं। ‘प्रतिशोध’ में दीना डोम के बच्चे को चेचक निकली है, वह पुजारी से सीतला देवी का नीर मांगने जाता है। पुजारी डांटकर भगा देता है कि नीर डोमों के घर नहीं जाता है। इसके बाद दीना की स्त्री धनिया चुपचाप मन्दिर में जाकर कुंड में से एक कटोरी नीर लेकर वापस जाने लगती है। पुजारी उसे देख लेता है। वह शोर मचाता है कि डोम ने मन्दिर अपवित्र कर दिया। तुरंत धर्म के रक्षक इकट्ठे हो जाते हैं, और वे लात-घूंसों से मार-मार कर धनिया को अधमरा कर देते हैं। उधर धनिया का बेटा इलाज के अभाव में मर जाता है। बाद में मन्दिर को शुद्ध करने के लिए हवन किया जाता है, उसी दौरान दीना नाटकीय ढंग से मन्दिर गिरा देता है। इसमें दीना का एक असम्भव प्रतिशोध दिखाया गया है। जो अछूत गाँव में पुजारी से लड़ने का साहस नहीं कर सकता था, वह मन्दिर गिराने का साहस करेगा, ऐसा सोचना भी हास्यास्पद लगता है।

 ‘अछूतोद्धार’ रामनाथ मिश्र के दोहरे चरित्र की कहानी है, जो बाहर अछूतों के उद्धार का स्वांग करता है और घर में जब उसे यह पता चलता है कि उसकी पत्नी सरला किसी म्लेच्छ की कन्या है, तो उसे त्यागने को तैयार हो जाता है। 

 ‘चमार की बिटिया’ कहानी का मुख्य विषय धर्मपरिवर्तन है। इसमें नगर के चमार पंचायत करके हिन्दुओं को अल्टीमेटम देते हैं, कि हमें कुओं से पानी भरने, उन स्थानों पर जाने, जहाँ तक मुसलमान और ईसाई जाते हैं, प्याऊ पर लोटे से पानी पिलाने, और मन्दिरों में दर्शन करने के अधिकार दिए जाएँ, वरना एक महीने के बाद हम मुसलमान बन जायेंगे। इस अल्टीमेटम से खलबली मच जाती है। तुरंत ही हिन्दू महासभा और आर्य समाज के नेताओं के प्रयास से नगरवासी हिन्दुओं द्वारा चमारों का यथोचित सम्मान किया जाता है, कई महाशय अपने लोटों से उन्हें जल पिलाते हैं, और उन्हें साथ ले जाकर देव-मन्दिरों के दर्शन कराते हैं। इस कहानी पर 1930 के दशक में उत्तर प्रदेश के कई जनपदों में घटित धर्मांतरण की घटनाओं का प्रभाव है। वास्तव में 1925 में बरेली में चमारों ने नगर में ऐसे ही पोस्टर लगाए थे, जिनमें लिखा गया था, “सभी जातीय भेदभाव समाप्त किए जाएँ, वरना सभी चमार एक माह बाद इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेंगे।” इसी तरह के अल्टीमेटम चमारों ने आगरा, खीरी, इलाहाबाद और बनारस जनपदों में भी दिए थे। गोरखपुर की पडरोना तहसील में 750 चमार ईसाई हो गए थे। उसी तरह मेरठ, बुलन्दशहर, इटावा और मुरादाबाद में भी चमारों ने धर्म-परिवर्तन किया था। ‘प्रताप’ की ख़बर के अनुसार, 1925 में ही बदाऊं जनपद में जमींदार के अत्याचारों से पीड़ित पांच हज़ार चमारों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था।  

 1920 के दशक में चमारों ने हिन्दू समाज की दो असमानताओं के विरुद्ध आन्दोलन शुरू किया था, उनमें एक था मन्दिर प्रवेश और दूसरा था सार्वजनिक कुओं से पानी लेने का अधिकार। आर्यसमाज ने न केवल इस आन्दोलन का समर्थन किया था, बल्कि दोनों असमानताओं को समाप्त करने के लिए शुद्धि आन्दोलन चलाया था। हिंदी साहित्य में उसी के बाद से अछूतों के लिए मन्दिर और सार्वजानिक कुओं पर अस्पृश्यता के विरुद्ध कहानियां लिखी गईं। बाद में हिन्दू महासभा भी इसके पक्ष में आ गई थी। प्रेमचन्द ने इन दोनों विषयों पर कहानियां लिखीं, एक मन्दिर, जो जहाँ आलोच्य है, और दूसरी ‘ठाकुर का कुआँ’। ‘मन्दिर’ कहानी में सुखिया का बच्चा बीमार है और वह मन्दिर में मनौती मांगने और पूजा करने मन्दिर जाती है, पर पुजारी उसे मन्दिर में नहीं घुसने देता है, और भगा देता है। बच्चे का ज्वर बढ़ता जाता है। वह रात के अँधेरे में तीन बजे बच्चे को कम्मल में ढांप कर मंदिर में जाने का प्रयास करती है, पर उससे पहले ही पुजारी की आँख खुल जाती है। पुजारी लोगों को भड़का देता है कि सुखिया ने मन्दिर के ठाकुर जी को भ्रष्ट कर दिया है। कई आदमी झल्लाए हुए आते हैं और सुखिया पर लात-घूंसे बरसाना शुरू कर देते हैं। बच्चा उसकी गोद से नीचे गिर जाता है, और उसके प्राण निकल जाते हैं। 

 ये हिन्दुओं के कठोर हृदय और उनकी निष्ठुरता की कहानियां मानी जा सकती हैं, किन्तु वास्तव में ये उनके धार्मिक आचरण की कहानियां हैं; जैसाकि डा. आंबेडकर ने कहा है, जाति हिन्दुओं को अमानवीयता की हद तक इसलिए नहीं ले जाती कि वे स्वयं अमानवीय प्रवृत्ति के हैं, बल्कि इसलिए ले जाती है, क्योंकि वे अपने धर्म में गहराई से विश्वास करते हैं, और अपने शास्त्रों की शिक्षा के ख़िलाफ़ नहीं जाना चाहते।  

 इस संकलन में विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ की ‘संपत पासी’ , कुलदीप सहाय की ‘बुद्धू’ , श्रीनाथ सिंह की ‘पिता-पुत्र’ , कुमारी सत्यवती झंवर की ‘हिन्दू जाति की धर्मान्धता’ , ऋषभ चरण की ‘बदला’ और श्यामापति पाण्डेय की ‘हसीना’ ऐसी कहानियां हैं, जो उस दौर की सबसे ज्वलंत अछूत-समस्या को इतने सतही तरीक़े से उठाती हैं, जैसे ऐसी कोई समस्या थी ही नहीं और हिन्दू समाज तो अछूतों के प्रति बहुत उदार था। संपत पासी सिंहपुर के ज़मींदार का चौकीदार है, और उसे ज़मींदार की ओर से बारह बीघे भूमि माफ़ी मिली हुई है। वह इतना वफ़ादार नौकर है कि नौकरी से हटाए जाने के बाद भी, और दूसरे ज़मींदार द्वारा कई प्रलोभन दिए जाने के बाद भी वह वफ़ादारी नहीं छोड़ता है, जिससे खुश होकर वह उसे फिर नौकरी पर रख लेता है, और चार बीघे ज़मीन उसे और दे देता है। 

‘बुद्धू’ चमार भी एक बैरिस्टर के बाग़ में नौकर है। उसे बाग़वानी का कोई ज्ञान नहीं है। बस यह जानता है कि पेड़ों को पानी देना ज़रूरी है। इसलिए वह हर समय पेड़ों को पानी देने में लगा रहता है। परिणामत: अधिक पानी देने से पेड़ मुरझा जाते हैं, और बाग़ सूख जाता है। इसके बाद भी बैरिस्टर उससे नाराज़ नहीं होते हैं, और उसकी पगार में दो रूपये और बढ़ा देते हैं। 

‘पिता-पुत्र’ में कृपाशंकर अछूतों से सामाजिक व्यवहार के विरुद्ध हैं, जबकि उनका पुत्र राधाचरण विपरीत स्वभाव का है। उसके घर एक वैवाहिक कार्यक्रम होता है, जिसमें डफली बजाने वाला एक मेहतर भी बांसुरी के साथ गाना गाता है, जो राधाचरण को बहुत प्रभावित करता है, और वह उस मेहतर को न केवल अपने गले लगा लेता है, बल्कि उसे खींचकर अपनी खाट पर बैठा लेता है। कृपाशंकर को यह बर्दाश्त नहीं होता है, और डंडा लेकर उस मेहतर पर पिल पड़ते हैं। दो-चार डंडे वह राधाचरण को भी लगाते हैं, और मेहतर के साथ-साथ उसे भी घर से भगा देते हैं। पर राधाचरण मेहतर का साथ नहीं छोड़ता है।

‘हिन्दू समाज की धर्मान्धता’ की कहानी यह है कि मनोहरलाल की धर्मपत्नी और पुत्र अपनी फिटन में जा रहे हैं कि अचानक उन पर डाकुओं का हमला हो जाता है। फिटन एक पेड़ से टकराकर पलट जाती है। वहीँ पास में एक वृद्ध चमार का झोंपड़ा है। वह अपने पुत्र गोपाल की सहायता से उन दोनों को उठाकर अपने झोंपड़े में ले जाता है, और उनकी सेवा करता है। पता लगने पर मनोहर लाल आकर अपनी पत्नी और बेटे को ले जाते हैं। वह उस बूढ़े को कुछ पैसे देना चाहते हैं। पर वह मना कर देता है। उसके सालभर बाद उसका पुत्र गोपाल अपने पिता की बीमारी में कुछ मदद मांगने मनोहरलाल के घर जाता है। वह उनकी बैठक में चला जाता है, जो मनोहरलाल को अपमानजनक लगता है। एक चमार बैठक में कैसे घुस सकता है? इसी बात पर वह गोपाल को ख़ूब गालियाँ देते हैं। मनोहरलाल की इस हृदय-हीनता पर उनके पुत्र विजन को क्रोध आ जाता है, और वह गोपाल को लेकर घर से निकल जाता है। बाद में दोनों ईसाई हो जाते हैं। कुछ समय बाद विजन घर लौट आता है, और उसकी शुद्धि हो जाती है। पर गोपाल ईसाई बना रहता है। पता ही नहीं चलता कि यह कहानी कहना क्या चाहती है? 

इसी तरह ‘बदला’ कहानी है, जिसमें दीना मोची के बेटे को रहीम जुलाहे का बेटा रहमत सिर्फ इसलिए मार देता है कि वह उसको सलाम नहीं करता है। दीना उसका बदला लेना चाहता है, पर यह सोचकर कि रहमत उसके बचपन के दोस्त रहीम का बेटा है, वह उसे माफ़ कर देता है। 

‘हसीना’ कहानी में तो और भी ग़ज़ब है, एक दम कबीर साहब के जीवन से उतारी गई। काशी में एक मेहतरानी को सुबह सड़क बुहारते हुए कूड़े में एक बच्ची मिलती है। वह उसे घर ले जाती है, उसे पालती है, और नाम रखती है हसीना। ज़ाहिर है कि वह किसी स्त्री की अवैध संतान है, जिसे वह लोकलाज के भय से कूड़े में डाल गई थी। वह जब जवान होती है, तो एक सवर्ण युवक उसकी ओर आकर्षित होता है। दोनों शादी कर लेते हैं। युवक डिप्टी कलेक्टर बन जाता है। एक दिन वे कुम्भ नहाने प्रयाग जाते हैं। वहाँ उन्हें एक भिखारिणी मिलती है। वह हसीना को गौर से देखती है, और पहचान लेती है। भिखारिणी कहती है, ‘मैं भी काशी की रहने वाली हूँ, ब्राह्मण-वंश की बेटी हूँ, आज अपने कर्म का फल भोग रही हूँ, यह मेरी ही बेटी है, मेरे ही पाप से इसका यह हसीना नाम पड़ा।’ हसीना ब्राह्मण है, यह जानकार हसीना और उसका पति, दोनों खुश हो जाते हैं। ब्राह्मण जन्म से होता है, यह कहानी यही बताना चाहती है।

कायापलट , तेजो की झोपडी , अछूत की बेटी , दासू भगत , मंगरू का भार , रामू भंगी , महंतजी , मन्दिर-प्रवेश , बाँसरी , चमारिन ललिता , धर्म-परिवर्तन , हाय पानी , कुएं पर आदि लगभग सभी कहानियां अछूतों को कुएं से पानी भरने और मन्दिर में देव-दर्शन कराने की बात करती हैं। इन कहानियों के रचनाकारों ने इन कहानियों में धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध ऐसे-ऐसे पात्रों की रचना की है, जो सौ-सौ जूते खाकर, और सारे अपमान सहकर भी हिन्दूधर्म में ही रहना पसंद करते हैं। यही नहीं, कई कहानियां ईसाइयों और मुसलमानों के विरुद्ध अछूतों की नफ़रत भी दिखाती हैं। जैसे, ‘हाय पानी’ का यह संवाद : 

‘माँ : भाई, मेरा बच्चा प्यास से व्याकुल है, थोडा पानी पिलवा दो।

बटोही : अरे कौन जात है तू?

माँ : हिन्दू चमार हूँ, महाराज।

बटोही : तो ले जा इसे। तेरे पानी के लिए अपना धर्म-कर्म डुबा दें? 

(इतने में एक मुसलमान आता है और कुएं पर चढ़कर पानी खेंचता है।)

मुसलमान पानी का गिलास लेकर चमारिन को कहता है—बहन, मैं मुसलमान हूँ। अगर मेरे हाथ का पानी पिलाने में कोई उज्र न हो, तो इस बच्चे को पिला दो।

माँ : तेरा भला हो भाई। पर क्या करूं, मैं अपना धर्म नहीं तोड़ सकती। मैं हिन्दू हूँ, धर्म के तागे को नहीं तोड़ सकती।’

 इसी तरह ‘कुए पर’ कहानी में सुचित चमार का यह कथन ‘मुझे तो जिस धर्म में मेरे बाप दादा पैदा हुए, वही प्यारा है। हम हिन्दू हैं और रहेंगे।’

इन कहानियों में अछूत पात्रों का मुस्लिम-विरोध अकारण नहीं है। प्रत्युत, यह अछूतों में आर्यसमाज और हिन्दू महासभा के शुद्धि-आन्दोलन का एक अनिवार्य हिस्सा था। इतिहासकार रामनारायण रावत के अनुसार, ‘चमारों में उनकी हिन्दू पहचान कायम करना ही आर्य समाज और हिन्दू महासभा का मुख्य उद्देश्य था। बिजनौर जिले के नजीबाबाद कस्बे में चमारों को शुद्धि के दौरान बताया गया था कि वे मुसलमानों से संपर्क नहीं करेंगे और मुस्लिम दुकानों से कुछ भी नहीं खरीदेंगे। जौनपुर जिले के बल्लाशपुर तहसील में चमारों से गऊओं की रक्षा करने और बदलापुर गाँव में उन्हें शाकाहारी बनने के लिए कहा गया था। हमीरपुर जिले में हिन्दू महासभा ने चमारों के गाँवों (चमरोटी या चमार टोला) में मुहर्रम के धार्मिक इस्लामी माह के दौरान, मुसलमानों के साथ कोई सहयोग न करने का अभियान चलाया था। इसी आन्दोलन का प्रभाव हमें प्रेमचन्द के उपन्यास ‘कर्मभूमि’ में दिखाई देता है, जिसमें रैदासी गाँव के चमार गोमांस और सुरापान छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार आर्य समाज और हिन्दू महासभा का शुद्धि आन्दोलन अछूत जातियों को हिन्दू बनाने के साथ-साथ उनमें मुस्लिम-विरोधी भावनाएं भी पैदा कर रहा था। यही कारण है कि इन कहानियों में अछूत पात्र मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोलते हैं। इसी मुस्लिम विरोधी नीति के तहत आरएसएस दलित वर्गों में हिंदुत्व का प्रचार कर रहा है।

इसी प्रचार की एक कहानी मदनमोहन लाल की ‘अछूत की आत्मकथा’ है। हालाँकि यह किसी अछूत की लिखी आत्मकथा नहीं है, बल्कि इसमें एक ऐसे अछूत युवक को कल्पना से गढ़ा गया है, जिसे पढ़ा-लिखाकर योग्य व्यक्ति बनाने का काम तो ईसाई मिशन करता है, और लेखक उसके मुख से प्रशंसा हिन्दू धर्म की करवाता है। यह रामू चमार की कहानी है, जो प्रिन्स्पिल को स्वयं बयाँ करता है। वह बताता है, पांच-छह वर्ष की अवस्था में उसके पिता का देहांत हो गया था। चाचा दुष्ट था, माँ को मारता-पीटता था। एक दिन वह मुझे लेकर घर से निकल गई। माँ को कहीं काम नहीं मिला, हम भूखे ही सो गए। भूख से व्याकुल होकर वह बाज़ार में एक जूता चुराकर भागता है, पर पकड़ा जाता है। जूते का मालिक उसे पुलिस में दे देता है। मामला मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुआ। मजिस्ट्रेट ने पूछा—

क्या तुमने जूता चुराया? 

हाँ! 

क्यों चुराया?’

मेरी माता और मैं भूखा था।

माता कहाँ है? 

बाहर से रोटी विलपती माता दौड़ी आई। हाथ जोड़कर बोली, सरकार, बच्चे का अपराध नहीं, मेरा अपराध है, मुझे दंड दीजिए। साहब ने फ़ैसला सुनाया, ‘जा तेरा बच्चा आगरे में पढ़ेगा, ख़र्च सरकार देगी।’

मिशन स्कूल में उसका दाख़िला करा दिया गया। एंट्रेंस पास किया, फिर कालेज में भर्ती हुआ, और वहां से बी.ए. करके निकला। आगे उसी के शब्दों में, ‘हाईस्कूल के हेडमास्टर से छह महीने का अवकाश ईसाई-धर्म पर विचार करने के लिए मैं नौकर हो गया। 75 रूपये मासिक मिलने लगा। मुझे यह चिंता चढ़ी थी कि छह मास पश्चात् या तो ईसाई-धर्म स्वीकार करना होगा अथवा नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। मैंने ईसाई-धर्म के ग्रंथों का अध्ययन किया और साथ ही साथ गीता, उपनिषद और दर्शनों के अंग्रेज़ी अनुवाद भी देखे। चाहे संस्कार कहिए, चाहे कुछ और समझिए, मेरा मन हिन्दू धर्म पर ही दृढ़ रहा।’

यह कहानी इसी प्रयोजन से लिखी गई कि अछूत जातियां अपने ऊपर हिन्दुओं के तमाम अत्याचारों और अपमान-तिरस्कार के बावजूद हिन्दू-धर्म पर दृढ़ रहे, ईसाई या इस्लाम धर्म स्वीकार न करें। एक तरफ हिन्दू समाज था, जो अछूतों को न इज्ज़त दे सकता था, न रोज़गार और न शिक्षा, और दूसरी तरफ ईसाई मिशन था, जो अछूतों को शिक्षित बनाकर उनका अछूतपन दूर कर रहा था, उन्हें रोज़गार दे रहा था, मनुष्य बना रहा था, और फिर भी उन पर यह दबाव नहीं था कि वे ईसाई बनें।

वास्तव में राष्ट्रवादयुगीन हिंदी साहित्य में अछूतों को केंद्र में रखकर लिखी गईं ये कहानियां अछूत-समस्या की कहानियां नहीं हैं। इनमें न तो अछूतों के लिए शिक्षा पर ज़ोर दिया गया है, और न उनके राजनीतिक अधिकारों को स्वीकार किया गया है। ये असल में उस दौर में कांग्रेस के विरुद्ध चल रहे अछूतों के आन्दोलन से उत्पन्न चिंताओं की कहानियां हैं। चमारों के आन्दोलन अंग्रेज़ सरकार के प्रति वफ़ादार थे। वे अपनी मुक्ति की आशा अंग्रेज़ों से करते थे, हिन्दुओं से नहीं। उन्होंने कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन से अपनी दूरी बनाकर रखी थी। 1920-22 में मेरठ में चमारों की सभा ने कांग्रेस के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया था। बिजनौर की अछूत सभा में, जिसमें सात हज़ार चमारों ने भाग लिया था, कांग्रेस के स्वराज की मांग का विरोध किया था। बदाऊं, बुलन्दशहर, देहरादून और कुमाऊं में भी अछूतों की सभाओं ने कांग्रेस के स्वराज के विरुद्ध प्रस्ताव पास किया था। कांग्रेस के प्रति चमारों की खुली शत्रुता को देखकर उत्तर प्रदेश की कांग्रेस कमेटी ने अपनी ज़िला इकाइयों को चमारों के साथ समतावादी सम्बन्ध बनाने के निर्देश जारी किए थे। इसी तरह, दिसंबर 1927 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में दो दिवसीय एक विशाल अछूत सम्मेलन स्वामी अछूतानन्द के नेतृत्व में हुआ था, जिसमें 25 हज़ार अछूतों ने भाग लिया था, और पंजाब, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, पूना, हैदराबाद और बंगाल से 350 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। एक दिन पूर्व इलाहाबाद में बग्गी-तांगों और गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकाला गया था, जिसमें कांग्रेस के विरोध और अंग्रेज़ सरकार के समर्थन में नारे लगाए गए थे। सम्मेलन में अछूतों के लिए तीन विचारों का प्रतिपादन किया गया था। एक, अछूत भारत के मूल निवासी हैं, जिन्हें हिन्दू ग्रंथों में दैत्य, असुर, राक्षस, दास-दस्यु बताया गया है; दो, अछूत हिन्दू नहीं हैं, और अगर हिन्दू समाज अछूतों को हिन्दू समझता है, तो वे अछूतों को समान अधिकार दें; और तीन, अछूतों को पृथक निर्वाचन क्षेत्रों के द्वारा विधायी संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए। इस सम्मेलन में दस प्रस्ताव पास किए गए थे, जिनमें अंग्रेज़ सरकार के प्रति निष्ठा और साइमन कमीशन के प्रति विश्वास व्यक्त किया गया था, एवं अछूतों के लिए सरकारी नौकरियों में स्थान, अछूत बच्चों के लिए शिक्षा और पर्याप्त संख्या में छात्रवृत्ति की मांग की गई थी।  

ये कहानियां इसी आन्दोलन की उपज थीं, जो अछूतों के संघर्ष और विचारों के खंडन में लिखी गई थीं।

(13/7/2024)

यह किताब यहाँ से मँगा सकते हैं :

https://amzn.in/d/7xoJDu2

Wednesday, February 28, 2024

हमारी राष्ट्रभाषा : हिन्दी या हिन्दुस्तानी (सुजीत कुमार सिंह)

 हमारी राष्ट्रभाषा : हिन्दी या हिन्दुस्तानी

सुजीत कुमार सिंह 



‘हिन्दी राष्ट्रवाद’ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में हिन्दी व उर्दू के बीच हुए बहसों को आधार बनाकर लिखा गया एक विचारोत्तेजक किताब है । इसे पढ़ते हुए मन उदास हो जाता है । दिल को एक धक्का-सा लगता है । शरीर की समूची शक्ति कहीं और चली जाती है । सात अध्यायों में फैले इस भाषायी झगड़े को पढ़कर क्रोध आता है । देखा जाए तो यह झगड़ा अभी ख़त्म नहीं हुआ है । आज के परिवेश में फ़ारसी लिपि को हिन्दू जनता ने अपना दुश्मन मान लिया है । भाषा की राजनीति अभी जारी है ।

ब्रिटिश उपनिवेश का हिन्दी-उर्दू के इस भयानक झगड़े में रुचि लेना देश के लिए ख़तरनाक सिद्ध हुआ । उसने हिन्दुओं और मुसलमानों को उकसाया । इससे संबंधित एक अध्याय ही इस किताब में ‘मैक्डानेल भये कोतवाल’ शीर्षक से है । इसी मैक्डानेल को साधने का काम किया मदनमोहन मालवीय और श्यामसुन्दरदास जैसे लोगों ने । मैक्डानेल को नागरी प्रचारिणी सभा में आमंत्रित कर उर्दू के ख़िलाफ माहौल बनाया गया । इसका नतीज़ा यह हुआ कि अदालतों में नागरी लिपि को स्थान मिला । यह सब राधाकृष्ण दास पर लिखे गये संस्मरणों में रोचक ढंग से मिलता है ।

भाषा के अध्येताओं का मानना है कि हिन्दी व उर्दू दो भाषा नहीं हैं । मामला संस्कृत और अरबी-फ़ारसी के शब्दों के मिलावट को लेकर है । हिन्दी वाले चाहते थे कि हिन्दी संस्कृतनिष्ठ हो और उर्दू जन अरबी-फ़ारसी मिश्रित । इस किताब में एक जगह लिखा है कि “गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे ने गांधी पर यह भी एक इल्ज़ाम लगाया था कि गांधी संस्कृत-प्रधान हिन्दी के ख़िलाफ थे ।’’ इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे ‘विशाल भारत’ (अक्टूबर 1942) में छपे सावरकर के एक भाषण की याद आती है । यह भाषण ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ शीर्षक से प्रकाशित है । 1942 के अगस्त माह में पुणे में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार संघ’ के वार्षिक अधिवेशन में विनायक दामोदर सावरकर ने कहा : “अब तो हिन्दी यानी हिन्दुस्तानी अर्थात् उर्दू सब एक ही है,  ऐसा  कहा जा रहा है । फ़र्क़ है सिर्फ़ लिपि का । अगर हम ऐसे ही सोते रहेंगे, तो हिन्दी के स्थान पर उर्दू का सिक्का जम जायगा । इसीलिए मैं कहता हूँ कि इस आन्दोलन में भी शुद्धीकरण की आवश्यकता है ।... हमारी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी-भाषा का घर चार दीवारों से मज़बूत चाहिए । उन दीवारों में दरवाज़ा, खिड़की आदि की आवश्यकता ज़रूर है, क्योंकि बाहर की हवा अन्दर आनी चाहिए । किन्तु उस दरवाज़े पर वैशम्पायन जी – जैसे संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के प्रहरी भी चाहिएँ ।... संस्कृतोत्पन्न हिन्दी राष्ट्रभाषा हो, यही मेरा विचार है । हमें संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का ही प्रचार करना चाहिए – उसके लिए चाहे जितना विरोध क्यों न खड़ा हो जाय । अगर अलग संस्था बनानी पड़े, तो राष्ट्रीय कार्य के लिए, राष्ट्रभाषा के प्रचार के लिए, हमें उस मार्ग पर चलना होगा । संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का मार्ग छोड़कर हिन्दी यानी हिन्दुस्तानी अर्थात् उर्दू के मार्ग पर हम कभी नहीं चलेंगे । संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ही हमारी राष्ट्रभाषा है और सदा रहेगी ।’’

इस किताब में एक बहस तत्कालीन स्कूलों के पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों को लेकर है । उस ज़माने की पाठ्यपुस्तकें साम्प्रदायिकता के रंग में रँगी हुई होती थीं । उर्दू या फ़ारसी पढ़ने से नौकरी आसानी से मिल जाती थी मगर हिन्दी के साथ ऐसा न था । आँकड़े बताते हैं कि फ़ारसी-उर्दू पढ़ने वालों की एक भारी संख्या हिन्दुओं की थी । यह सब हिन्दीसेवियों को असह्य लगता । नागरी  प्रचारिणी सभा ने अपनी स्थापना के आरम्भिक वर्षों में ही यह तय किया था कि हमें हर हाल में ‘शिक्षा कमेटी’ में अपने लोगों को प्रवेश कराना होगा । इस दौर की पाठ्यपुस्तकों को लेकर दोनों वर्गों में जबर्दस्त तनाव का माहौल मिलता है । उर्दू के विरोध में किसिम-किसिम की हिन्दी में पुस्तिकाएँ लिखी गयीं । आलोक राय ने सोहन प्रसाद की नाटिका ‘हिन्दी उर्दू की लड़ाई’ का ज़िक्र किया है । इसी तरह ‘उर्दू बेग़म’ उस दौर की एक मशहूर पुस्तिका थी जिसके बारे में नवजादिकलाल श्रीवास्तव ने महादेवप्रसाद सेठ से संबंधित एक संस्मरण में इसका नाम लिया है । इस संस्मरण से यह पता चलता है कि इस तरह की पुस्तिकाओं का अबोध बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता था । जून 1936 के ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित अपने संस्मरण में नवजादिकलाल श्रीवास्तव लिखते हैं : “(महादेवप्रसाद) मिरज़ापुर के मिशन स्कूल में पढ़ते थे, तभी से उर्दू में ग़ज़लें लिखा करते थे । तख़ल्लुस शायद ‘रज़ा’ था ।... मिशन स्कूल के कोई मौलवी साहब ही उनके उस्ताद थे । ये उन्हीं से इस्लाह लिया करते थे ।... उस समय ‘उर्दू बेग़म’ नाम की पुस्तक की मिरज़ापुर में बड़ी धूम थी । सेठजी ने भी यह पुस्तक पढ़ी, और तभी से उनका झुकाव हिन्दी साहित्य की ओर हुआ ।’’

इस किताब से यह पता चलता है कि क्यों अयोध्याप्रसाद खत्री के ‘खड़ी बोली आन्दोलन’ को तत्कालीन साहित्यकारों ने कोई तवज्जो नहीं दी ! नागरी प्रचारिणी सभा के ‘गृहप्रवेशोत्सव’ में श्यामसुन्दरदास ने ग्रुप फोटो के लिए गुलेरी जी को तो बुलाया लेकिन खत्री जी को जानबूझकर पूछा तक नहीं । कारण यह था कि कामताप्रसाद गुरु ने लोगों को बताया कि खड़ी बोली उर्दू के काफ़ी करीब है । इस करीबी के नाते ही खत्रीजी का आन्दोलन फ्लॉप हो गया ।

खड़ी बोली और ब्रजभाषा के बीच हुए तक-झक को आलोक राय ने एक अध्याय में समेटा गया है । भारतेन्दु सहित तमाम साहित्यकारों का यह मानना था कि खड़ी बोली में कविता नहीं हो सकती । यह धारणा द्विवेदी युग के आरम्भ तक चलती रही । किन्तु प्रतापनारायण मिश्र जैसे लोग यह जान गये कि आने वाला कल खड़ी बोली कविता का ही है । महावीरप्रसाद द्विवेदी ने तो ब्रजभाषा के खिलाफ़ मोर्चा ही खोल दिया था । छायावादी कवि पंत ने ‘पल्लव’ की भूमिका में जहर उगला । इस अध्याय से पता चलता है कि यह सब सुनियोजित था । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि रामचंद्र शुक्ल जैसे लोग ब्रजभाषा को किसी क़ीमत में ख़त्म होते नहीं देखना चाहते थे ।

‘ये कहाँ आ गये हम’ शीर्षक अध्याय में संवैधानिक बहसों को आधार बनाकर हिन्दी-उर्दू विवाद पर प्रकाश डाला गया है । भाषायी बहस के उस तीखे माहौल का उदाहरण आलोक राय ने यों दिया है : “ड्राफ्टिंग कमेटी के एक सदस्य, एम. सत्यनारायण, के हवाले से मिले एक सायक्लोस्टाइल्ड दस्तावेज़ में इस सिलसिले की एक झलक मिलती है । नेहरू ने उनसे भाषाओं की एक सूची बनाने को कहा । उन्होंने जो सूची तैयार की उसमें हिन्दुस्तान की 12 भाषाएँ शामिल थीं । नेहरू ने उस सूची को कमेटी के सामने रखने से पहले, एक नाम और जोड़ दिया – उर्दू का । जब एक ‘हिन्दी मित्र’ ने पूछा कि ये उर्दू आख़िर किसकी भाषा है, तो उस पर नेहरू ने तन्ना के कहा – “ये मेरी और मेरे बाप-दादाओं की भाषा है ।’’ इस पर उस ‘हिन्दी मित्र’ ने निशाना साधा : “ब्राह्मण होते हुए उर्दू को अपनी भाषा कहते हो, शर्म नहीं आती ?’’ नेहरू ने जवाब नहीं दिया ।’’

यह किताब बीसेक साल पहले अँग़रेजी में आई थी । तब स्त्री और दलित विमर्श हिन्दी साहित्य के केन्द्र में थे। इस किताब में अगर दलितों और स्त्रियों को आधार बनाकर लिखे जा रहे तत्कालीन लेखों का भी विवेचन होता तो ‘हिन्दी राष्ट्रवाद’ का मुकम्मल चेहरा सामने आता । अब जरूरत है कि हाशिए का जीवन जीने वाले वर्गों को भी कथित हिन्दी राष्ट्रवाद में स्थान दिया जाय । इससे हिन्दुत्त्व का खौफनाक रूप उजागर होगा । नवजागरणकालीन साहित्य को खँगालते हुए हम पाते हैं कि हिन्दू सुधारक धर्मशास्त्रों में फेरबदल के बिल्कुल खिलाफ थे । वे धर्मशास्त्र और वर्ण-व्यवस्था को बचा लेना चाहते हैं । ‘प्रभा’ की फाइलों को देखने से ज्ञात होता है कि कुंवरनारायण सिंह, दुर्गाप्रसाद शुक्ल जैसे लोग वर्ण-व्यवस्था को ‘स्वाभाविक’ मानते थे । इन लोगों की चिन्ता यह थी कि अछूत शिक्षित हो गये तो वे हमारी बराबरी कर लेंगे । सांवरमल नागर, श्रीप्रकाश आदि दलितों-पिछड़ों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं । ये लोग पैतृक पेशों को बचाने के लिए अपील करते नजर आते हैं । 1910 ई. में प्रकाशित ‘सच्चा-सुधार’ पुस्तक में पाण्डेय रामलोचन शर्मा लिखते हैं : “कुरमी, कहार इत्यादि सभी को अपने सुधार की सनक चढ़ी हुई है, सभी को ब्राह्मण क्षत्री बनने का शौक चर्राया है । परम्परा से करते आये अपने बाप दादा के काम को लात मार कर खासा ज्यन्टलमैन बनने का लार टपका रहा है ।’’

इस कथित हिन्दी राष्ट्रवाद में जब दलित, पिछड़े और स्त्रियाँ हाशिए पर धकेल दी गयीं, इन्हें शास्त्रानुसार बाँधने की कोशिश की गयी तो भद्र हिन्दू वर्ग मुसलमानों को क्यों अपने राष्ट्र में तरजीह दे । आज डंके की चोट पर यह ऐलान किया जा रहा है कि ‘हम दो हजार साल पुराना भारत चाहते हैं ।’ आप दो हजार साल पुराने भारत को महसूस करना चाहते हैं तो उन नवजागरणकालीन साहित्य का अध्ययन करना होगा जिसे हिन्दी के आलोचकों ने नज़र अन्दाज़ कर दिया है ।


समीक्षित पुस्तक : हिन्दी राष्ट्रवाद (आलोक राय)

प्रथम संस्करण : 2022

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।

मूल्य : 250


सुजीत कुमार सिंह 

हिन्दी विभाग,

गवर्नमेंट पीजी कॉलेज, हमीरपुर- 210301 (उत्तर प्रदेश)

मोबाइल : 9454351608

ई-मेल : sujeetksingh16@gmail.com 


Thursday, April 22, 2021

आर्य समाज का भंगी : श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'

 


कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'




"तू बड़ा बदमाश है बे! कल शाम क्यों नहीं आया था? वेतन माँगने तो 20वें ही दिन आ धमकता है और काम करते कलेजा फटता है सूअर का!"

"वेतन ही कौन सा अठमाशी दे देते हैं आप मुझे? इतना बड़ा चौक है, कन्या पाठशाला के कमरे और तीन पाखानों की तरफ़! तब कहीं दस आने पल्ले पड़ते हैं।"

"जहाँ अठमाशी मिले, वहाँ चला जा। बदमाश, गज भर की ज़बान निकालता है हर वक़्त! सारी दुनिया में जो क़ायदा है, वही हम देते हैं।"

 

यह हमारे प्रांत की एक प्रसिद्ध आर्य समाज के महामंत्री और आर्य समाज के मंदिर के भंगी नानक के बीच होने वाली एक आम 'इंटरव्यू' का नमूना है। महामंत्री जी आर्य समाज के बहुत अच्छे लेक्चरार हैं। अछूतोध्दार उनका ख़ास विषय है और उस पर जब वे बोलते हैं, तो कलेजा निकाल कर रख देते हैं। उस समय ऐसा मालूम होता है कि उनके मुँह से मनुष्यता की नदी बह रही है। मनुष्य मात्र की समानता के सिद्धांत का निरूपण करके जब वे अछूतों पर होने वाले अत्याचारों की कथा कहते हैं और पब्लिक की आँखों में भी करुणा की गंगा बह उठती हैं। 

यह हमारे जीवन में बहने वाली विचारधाराओं के दो चित्र हैं, एक व्यवहार का और दूसरा विचार का। विचार वही स्थान है, जो आत्मा  का,पर आत्मा शरीर के साथ ही जैसे काम करती है, वैसे ही विचार भी व्यवहार में आने के बाद ही अपनी शक्ति को प्रदान करता है। ऊपर के चित्र इस बात का प्रमाण हैं कि आज हमारे जीवन में - सिद्धांत और व्यवहार में एकता नहीं है। यह भयंकर स्थिति है। 

(1942)

 

 

 

Friday, February 26, 2021

गोरखपुर की पत्रकारिता

 गोरखपुर जनपद साहित्य के क्षेत्र में कितना उर्वर है, इसे हम जैसे विद्यार्थी बहुत ही कम जानते हैं। यों कहिए कि कुछ नहीं जानते। गोरखपुर की नागरी प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से पंडित मन्नन द्विवेदी गजपुरी लिखित एक पुस्तिका सन् 1911 ई. में गोरखपुर विभाग के कवि शीर्षक से छपी थी। इसमें आज़मगढ़ और बस्ती ज़िले के कवि तो हैं ही गोरखपुर के गोपालपुर, मझौली, गजपुर, गगहा, कोठा आदि के रचनाकारों का भी ज़िक्र है। 


पीपीगंज से कवि (1909) नाम की पत्रिका निकलती थी तो गगहा से समालोचक (1925)। विशुनपुर से प्रभाकर (1915) पत्रिका की प्रशंसा मैनपुरी निवासी नारायणप्रसाद गौड़ ने अपनी पत्रिका में की तो गोरखपुर के ही शिवकुमार शास्त्री सम्पादित ज्ञानशक्ति  (1916) की समीक्षा और प्रशंसा भानुंजय सहाय, रामजी लाल शर्म्मा और कृष्णकांत मालवीय ने अपने-अपने पत्रों में। स्वदेश के बारे में सभी जानते ही हैं। 1921 में विन्ध्यवासिनी प्रसाद बीए, एलएलबी के संपादन में 'युगांतर' (साप्ताहिक) निकला और इसका चरखा-अंक बहुचर्चित रहा। बहरहाल... मैं ज़्यादा विस्तार में न जाकर मूल बिंदु पर आना चाहूँगा। उपर्युक्त पत्रिकाएँ तो इतिहास में दर्ज़ हैं लेकिन जो बात मुझे कचोट रही है, वह है एक ऐसी पत्रिका जिसके सम्पादक से मेरी बातचीत है। जिनके घर से मेरा निकटतम संबंध है। उनके कृतित्व के बारे में थोड़ा बहुत जानता भी हूँ। 

इलाहाबाद के हिंदी साहित्य सम्मलेन में सारिका उलटते-पलटते जब उनका नाम देखा तो मन कितना उदास हो गया, यह बता पाना यहाँ कठिन है। यह सब पढ़ते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष और मेरे आदरणीय गुरुदेव प्रो. अनिल कुमार राय का सम्पूर्ण व्यक्तित्त्व मेरे ज़ेहन में आ गया। आग का राग! बस्स, यही एक नाम। अपने गुरुदेव से उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व के संबंध में न हमने कभी पूछा और न उन्होंने कभी बताया। 

जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ श्री माधव मधुकर जी के बारे में। 

कन्हैयालाल नन्दन संपादित 1 दिसंबर 1978 की सारिका में नयी पत्रिकाएँ स्तंभ में रमेश बत्तरा ने श्री माधव मधुकर संपादित संभावना की एक दिलचस्प समीक्षा लिखी है। गोरखपुर की साहित्यिक पत्रिकारिता में जो एक आग है, वह इस समीक्षा द्वारा समझा जा सकता है। पूरी समीक्षा यों है-

💥

संभावना (सं: माधव मधुकर) राजभवन, रायगंज, गोरखपुर। 

किसी पत्रिका द्वारा रचनाओं और चयन की दृष्टि से व्यक्ति और दल की सीमाओं से ऊपर, सही रचना चुनने की 'विनयपूर्वक' दी गयी सूचना को 'निरपेक्ष उफानदारी' माना जाए या अमूर्त्त संपादकीय व्यक्तित्त्व अथवा अपने तौर पर 'कीचड़-कमल' के गुमान में गुम एक और अ-दलगत अखाड़ा? 'संभावना' ने जो कुछ कहना चाहा है, उसे इस स्तर भी स्पष्ट  कर दिया होता तो इसके आसार और भी बेहतर हो जाते हैं, क्योंकि जब तक यह सवाल साफ़-साफ़ जवाब नहीं पायेंगे तब तक सामाजिकता, परिवर्तन, क्रांतिकर्म, प्रगतिशील आदि शब्द अपने सही अर्थ हासिल नहीं कर पायेंगे। 

इसके बावज़ूद प्रस्तुत अंक में 'कविता' को मिट्टी की गंध में से खगालने की कारगर कोशिश की गयी है। रमेश रंजक, हरिहर द्विवेदी, आलोक धन्वा, श्रीहर्ष, विनय श्रीकर की रचनाओं  सन्दर्भ में सवालों से जुड़-जुड़कर जवाब भी देते हैं और वर्तमान हिंदी कविता में यह प्रवृत्ति संभव है। अपने इस प्रारूप में कविता को फिर से इसकी खोयी हुयी जनप्रियता दिलवा दे-

खामोश मत देखो 

भूखी लाश को खाली पड़े कटोरे-सी 

या गोली मारे गए आदमी को 

खून सने बोरे-सा 

जबान खोलो ...  (सर्वेश्वर)

           ****      *****      *****      *****

मैं समझता था कविता लिखना, खबरें लिखने से बड़ा काम है 

और वह आदमी सचमुच महान है 

जो अपनी कविताओं में ख़तरनाक़ खबरें सुनाता है 

और 'अभिव्यक्ति के खतरे' उठाता है। (कुमार विकल) 

कविताओं का य.............  मूलत: परिचर्या (समकालीन ....... कुछ सवाल) में भी उभरा है और विशेषतः चंचल चौहान के कथन में कि - छंद लोक का हो या परलोक का, तब तक कुछ न कर पायेगा जब तक कवि उसमें सही समझ और संवेदना को व्यक्त नहीं करता।

'संभावना' में दिविक रमेश, नचिकेता, दिनेश जोशी, अश्वघोष, ठाकुर प्रसाद सिंह, डी.प्रेमपति, शिवशंकर मिश्र, अजातशत्रु और मैनेजर पाण्डेय की रचनाएँ अपने आप उल्लेखनीय हैं। 'सताये हुए लोगों के पक्षधर' ये साहित्यिक कविता के परिप्रेक्ष्य में जितनी ज्वलंत और तथ्यात्मक स्थितियों का पर्दाफ़ाश कर पाये हैं, तुलना में 'कहानीपक्ष' उतना ही कमजोर और बेजान है। इस संदर्भ में 'कहानी के अभाव' को देखते हुए हमारे चिंतक-समीक्षक क्या सोच या तय कर रहे हैं? यह सवाल जवाब मांगता है। ■ र.ब.


(............ अस्पष्ट)

 


प्रस्तुति : सुजीत कुमार सिंह 

Wednesday, January 20, 2021

हंस का रेखाचित्रांक : आशीष सिंह



(एक)

आज हमारे बीच  हिन्दी गद्य की विविध विधाओं में से अधिकतर उपन्यास, कहानी, साक्षात्कार, यात्रा वृतांत  , समीक्षा, जीवनी  का ही  जिक्र ज्यादा मिलता है। हम सोचते हैं और सोचते रह जाते हैं कि पिछली बार किस पत्रिका में कोई विचारपरक निबंध, ललित निबंध या रेखाचित्र जैसे लगभग भुलाई जा रही गद्य विधाओं को पढ़ा था या देखा था। अगर कोई नाम याद आता भी है तो कभी कभार 'यायावर की डायरी ' के लेखक सत्यनारायण जैसे एकाध भूले भटके साहित्यकारों की लेखनी से उभरे शब्दचित्रों तक आकर ठहर जाता है। आखिर इसकी क्या वजहें हो सकती हैं ! मन लगातार सोचता है। क्या आज कहानी -उपन्यास जैसे पहली पंक्ति में दर्ज होने वाली विधायें अपने में ललित निबंध या शब्दचित्र के बहुलांश रूप में समेट ले रही हैं इसीलिए स्वतंत्र रूप से इनकी जगहें सिकुड़ती जा रही हैं या कुछ दूसरी वजहें हैं?  रम्य गद्य रचनाओं के जरिए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, धर्मवीर भारती, विवेकी राय, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय जैसे तमाम साहित्यकारों ने अतीत में गंभीर से गंभीर विषय को बेहद संप्रेषणीय सहज लहजे में पाठकों तक पहुंचाने का काम किया है । खैर !

आज जब इस किताब को  जिसे आधुनिक हिन्दी साहित्य के अध्येता व पुरानी साहित्यिक पत्रिकाओं के पीले पड़ चुके हर्फो को आहिस्ते-आहिस्ते टटोलकर बाहर लाने की कोशिश में लगे भाई सुजीत कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया है, देखकर कुछ कहे बगैर मन मान नहींं रहा। इस किताब पर पहले भी लोगों ने अपनी बातें कही होंगी और आगे भी कहेंगे। इस किताब में मौजूद सामग्री की ऐतिहासिक महत्ता ही नहीं बल्कि हिन्दी भाषा के लिए समर्पित सम्पादकों की अटूट निष्ठा भी हम तक हस्तान्तरित हो रही है। शब्दचित्र, नखचित्र या रेखाचित्र के नाम से जानी जाने वाली चर्चित गद्य विधा के बिल्कुल शुरूआती समय में स्थापित करने की कोशिशों का एक नमूना भी यहाँ देखने को मिलता है। मार्च 1939 का हंस रेखाचित्रांक के रूप में निकला था, जिसके सम्पादक श्रीपत राय जी थे। उन्होंने हिन्दी गद्य में उभरती एक नयी विधा 'रेखाचित्र' को रेखांकित करने के लिए ही हंस का यह अंक प्रकाशित किया था। इस अंक में न केवल तत्कालीन साहित्यिक हस्तियों के व्यक्तिव का रेखांकन मिलता है बल्कि साथ ही साथ उनकी  वैचारिकी का सांगोपांग चाक्षुष छवि देखने को मिलती है। जैसे निराला के बारे में आलोचक रामविलास शर्मा "निराला" शीर्षक से लिखे रेखाचित्र में कहते हैं कि 

उनकी कविताओं में जो अद्भुत पुरुषार्थ व्यक्त है, जो विद्रोह की, विजय-कामना की भावना वर्तमान है, वह बैसवाड़े की भूमि की श्रेष्ठ देन है। सड़कों पर मैले कुचैले कपड़े पहने, तोहमत में स्याही का भारी धब्बा लगा हुआ, फटे चप्पल या नंगे पैर बड़े बाल रखाये उसे लापरवाही से अमीनाबाद में चलते देखा है। लोगों ने कहा - 'जानबूझकर कहता है सनकी है'। कुछ नहीं, वह सामाजिक विद्रोह की भावना मात्र थी। 'तुमने कपड़ों को पूजना सीखा है ,मनुष्य का आदर करना नहीं। 'देवी' कहानी में 'निराला' ने पगली को देवी बनाके पूजा है।  


आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का स्केच खींचते हुये जाने-माने अभिनेता व लेखक बलराज साहनी मंद स्मित भावभंगिमा भरी भाषा-शैली का प्रयोग करते हुए अपनी बात कुछ इन शब्दों से शुरू करते हैं :

द्विवेदी जी में एक दोष है। ढीलम-ढालम रहते हैं, हजामत हफ़्ते में एक बार से अधिक नहीं करते; तिस पर जो व्यक्ति पहली नज़र में उन्हें जंच जाए उसकी खैर, जो न जंचे  उसे सामने बिठाकर उसके मुंह की ओर देखते रहते हैं। इसलिए कई महानुभाव शान्ति-निकेतन से यह धारणा बनाकर लौटते हैं कि द्विवेदी जी वैरागी आदमी हैं। 


'भेड़िए ' कहानी के लेखक और कई एब्सर्ड एकांकी के रचनाकार भुवनेश्वर प्रसाद  शब्बीर हसन 'जोश' मलीहाबादी पर लिखते हुए बड़ी मानीखेज तथ्य सामने रखते हैं। वे 'जोश ' को इंकलाबी शायर ही नहीं बल्कि सही मायने में भारतीय परम्परा को देखने वाले शायर बताते हुए कहते हैं कि -

तो जोश के कवित्व के उद्गम की खोज कहाॅं की जाय । 'जोश' अंग्रेजी कविता और साहित्य से अछूता है, इतनी अंग्रेजी कभी जानी नहीं। इक़बाल के "पैन इस्लामिज़्म'' का उस पर असर नहीं पड़ा। वह सन् 1920 तक में खि़लाफत आन्दोलन का कायल न हो सका । उसके प्रिय कवि हैं हजार साल पुराने 'का़वी ' और 'फिरदौसी'।


फिरदौसी ' ईरान का हेलर है। यही नहींं, दसवीं शताब्दी में 'फिरदौसी' ने ही अरबों के विरुद्ध झंडा गाड़ा था, जब उसने इस्लामी बुजुर्गों के गीत न गाकर यारा, नौशेरवां, रुस्तम और सोहराब का राग अलापना शुरु किया। लेकिन वह विद्रोह बहुत निर्बल था। ईरानी जन-समुदाय उससे उदासीन था और अब तक रहा। तभी तो मरने पर 'फिरदौसी' को सार्वजनिक कब्रिस्तान में दफ़न करने की इजाज़त नहींं मिली, और मजबूरन वह अपने घर में दफ़न किया गया। हजार साल तक 'शाहनामा ' ईरान में ही नहींं, भारत तक में, बहुत लोकप्रिय रहा सो भी काव्य रसास्वाद और मनोरंजन के लिये, जातीय जोश को उभारने के लिये नहींं। किन्तु महासमर के बाद ईरान के नवयुग में 'शाहनामा' ईरान का वेद है, 'फिरदौसी' ईरान का ब्रह्मा  है। 'फिरदौसी' की क़ब्र को लोग बिलकुल भूल गये थे। बड़ी मुश्किल से तूसी शहर के खंडहरों को खोदकर वह निकाली गई, और ईरान ने अपनी खानों के कीमती संगमरमर से उसका आलीशान मक़बरा बनाया। दरवाजों और दीवारों पर 'शाहनामा' के प्राचीन ईरानी वीरों और सम्राटों की मूर्तियाँ खोदी गई हैं। यह सरासर इस्लाम के खिलाफ है। 'जोश' अगर राष्ट्रीय कवि है तो वह बहुत अंश में 'फिरदौसी' की तरह। वह भी प्राचीन गौरव की दुहाई देता है, वह भी बीते हुये को गर्व और जलन से देखता है और वर्तमान पर आठ-आठ आंसू रोता है, दांत किटकिटाता है। उपमाओं में अर्जुन और अभिमन्यु को याद करता है और तलवार ऐसी चीज़ की याद दिलाता रहता है ।

 'जोश ' हिन्दुस्तान का 'फिरदौसी 'ही नहींं है वह विक्टर ह्यूगो भी है।

'जोश' क्रांति का कवि है न।


  (दो)                             

सियारामशरण गुप्त पर लिखते हुए अज्ञेय ने उनके निष्ठा, सहजता और  ज्ञान पिपासु छवि का सुंदर रेखांकन प्रस्तुत किया है। राहुल सांकृत्यायन, मैथिलीशरण गुप्त, बच्चन, दिनकर, श्यामसुंदर दास, महादेवी वर्मा, जैनेंद्र, काका कालेलकर, जैसे तमाम हिन्दी सेवियों के साथ ही सम्पूर्णानन्द, बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे पत्रकारों-राजनीतिज्ञों के विचारवान व्यक्तित्व की झांकी प्रस्तुत करते रेखाचित्र भी हैं। अहिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्र के लेखकों, विचारकों पर लिखे शब्द चित्र को अनुवाद कराके श्रीपत राय जी ने हंस में प्रकाशित कराया। एक तरह से यह प्रयास रेखाचित्र के तत्कालीन  अखिल भारतीय रूप की निशानदेही भी करती है। हमारे पूर्वजों के द्वारा हिन्दी के संवर्धन के लिए किये प्रयासों को याद दिलाती यह प्रस्तुति उल्लेखनीय है। प्रस्तुतकर्ता व सम्पादक  सुजीत कुमार सिंह जी का यह काम बड़े महत्व का है ।                             

और अन्त में भूमिका में उद्धृत एक वाकये का जिक्र किये बगैर मन मान नहीं रहा तथैव वह चित्र व संदर्भ आपके लिए प्रस्तुत है। यह संदर्भ हिन्दी की विविध विधाओं की अधोगति या एकांगी विकास को चिन्हित करती आज भी उतनी ही तीखी टिप्पणी सी लगती है- 

हिन्दी की इस अवस्था को ही देखकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने फरवरी-मार्च 1903 की 'सरस्वती' में 'साहित्य समालोचना/ साहित्य सभा ' शीर्षक एक व्यंग्य चित्र प्रकाशित किया था। इस चित्र में नौ कुर्सियाँ हैं जिसमें पहली कुर्सी 'इतिहास' की है जो खाली है। दूसरी 'जीवन चरित' की है‌, वह भी खाली है। तीसरी कुर्सी 'पय् र्यटन' की है जिस पर एक बाबू साहब बैठे हुए हैं। चौथी कुर्सी 'समालोचना' की है जिस पर हाथ में दर्पण लिए मनुष्य वेश में एक बन्दर बैठा है। पांचवी कुर्सी  'उपन्यास' की है। कुर्सी के पास एक बंदर-बकरी लिये एक मदारी को खड़ा दिखलाया गया है। छठीं कुर्सी 'व्याकरण' की है, जिसे महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'व्या-(धि ) -करण' लिखा है। सातवीं  'काव्य' और आठवीं 'नाटक ' की है । 'नाटक'  वाली कुर्सी पर एक कृशकाय मनुष्य बैठा है जिसकी ठठरियां दिख रही हैं। नौवीं कुर्सी ' कोश ' की है और खाली है। इस साहित्य-सभा को देखकर सरस्वती माता रो रही हैं। महावीरप्रसाद द्विवेदी की व्यथा को आसानी से समझा जा सकता है।   

प्रतीकात्मक तौर पर प्रस्तुत यह व्यंग्यात्मक रेखांकन बहुत कुछ कह दे रहा है। यह उस समय के लेखकों के साहित्य और जीवन को देखने के नजरिए का दर्शन भी कराता है।

अपनी पुरानी पोथियों से खंगाल कर बहिरियाने का उद्यम प्रशंसनीय है, कीमती भी है। हम सब हिन्दी पाठकों के लिए एक जरूरी पुस्तक है यह।


------

हंस का रेखाचित्रांक 

भूमिका एवं प्रस्तुति : सुजीत कुमार सिंह

प्रकाशक- 

शिल्पायन 

10295, लेन नं. 1, वेस्ट गोरखपार्क,

शाहदरा, दिल्ली -110032

silpayanbooks@gmail.com


मूल्य -  300 ₹  (पेपरबैक)

____________________________________


आशीष सिंह 

युवा आलोचक,

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

Sunday, October 18, 2020

असहयोग : एक राष्ट्रीय आत्मा

 








असहयोग 

एक राष्ट्रीय आत्मा 


सुख - समृद्धि की कौन कहे, अब तो दुर्लभ आहार हुआ। 
नित्य   भार   ढोते - ढोते,  दीनों  का   जीवन  भार  हुआ।।
आश्वासन   का  अर्थ    गूढ़   भाषा   में   अत्याचार  हुआ। 
शीतल - मन्द - समीर, हाय, कमलों के लिये तुषार हुआ।।
अमर - लोक  में  असुर - त्रास से भीषण हाहाकार हुआ। 
असहायों  के   लिये  अंत  में   असहयोग  आधार  हुआ।।

यह    कैसा   व्यापार   देश   में   करने  व्यापारी  आये। 
नीति,  न्याय,  विज्ञान,  धर्म   की  गठरी  वे  भारी  लाये।।
प्रेमी   बनकर  भांति  भांति  के  वचन  सुनाये  मनभाये।
क्रमश: नित - नूतन,  विचित्र अपने हथकण्डे दिखलाये।।
वणिकों की दूकान बदल कर दिव्य राज - दरबार हुआ। 
असहायों  के  लिये  अंत  में  असहयोग  आधार  हुआ।।

कर  देंगे   स्वच्छन्द  तुम्हें,  है  अभी  नीति  का  ज्ञान  नहीं। 
सारासार - विचार,  झूठ - सच  क्या है, कुछ पहचान नहीं।।
राज - भक्त रह कर, देना कुछ कूट - नीति पर ध्यान नहीं। 
स्वतन्त्रता    देवी   की   वेदी   पर   होना   बलिदान   नहीं।।
चतुरों  की  इस  चतुर  चाल  को  देख  चकित संसार हुआ। 
असहायों   के   लिये   अंत   में   असहयोग  आधार   हुआ।।

देश - भक्ति   ही  राज - द्रोह है,  लेना  उसका  नाम  नहीं। 
जन्म सिद्ध अधिकार - प्राप्ति की चर्चा का कुछ काम नहीं।।
छेड़ोगे   यदि   तान   मुक्ति   की   पाओगे   विश्राम   नहीं। 
मृत्युलोक   में   जीवित - मृत  पुरुषों  को  है  आराम  नहीं।।
कुशल  कर्मवीरों  का  आश्रम  दुःख-मय  कारागार  हुआ। 
असहायों   के   लिये   अंत   में   असहयोग  आधार  हुआ।।

यूरोपीय  समर  में  जिनने  अपना  रुधिर बहाया है। 
आर्यों का वीरत्व जिन्होंने सब जग को दिखलाया है।। 
है  वह भी  प्रत्यक्ष उन्होंने  जो  उसका फल पाया है। 
देख  लिया  हा हन्त ! दैव  की कैसी निष्ठुर माया है।। 
विजयी वीरों को बदले में रौलट - बिल उपहार हुआ। 
असहायों  के लिये  अंत में असहयोग  आधार  हुआ।।

अति निराश हो बने हाय हम जब सत्याग्रह व्रत - धारी। 
कर  लें   अत्याचार   चैन  से   निबलों  पर  अत्याचारी।।
शान्त  खड़े  हैं, कर  लें जी - भर मनमानी स्वेच्छाचारी। 
दिखला   लें   निश्चिन्त   निरंकुशता  अपनी   सत्ताधारी।।
अमृतसर  में  अमर - वंश  का  शस्त्रों  से  संहार हुआ। 
असहायों   के  लिये  अंत  में असहयोग  आधार  हुआ।।

अनजानों  को  रेंग  रेंग  डायर  ने  चलना  सिखलाया। 
परतन्त्रों को मार और  गम  खाकर पलना सिखलाया।।
अबलाओं की लाज लूट,  गलियों में गलना सिखलाया।
अकर्मण्य पुरुषों को पछताना, कर मलना सिखलाया।।
हाँ, असभ्य भक्तों के प्रति यह सभ्यों का व्यवहार हुआ। 
असहायों   के  लिये  अंत  में असहयोग  आधार  हुआ।।

कायरता - द्योतक  बहादुरी  के  झूठे  पद  छोड़ दिये। 
स्वार्थ,  शृंखला - बद्ध  देख  धोखे  के  टट्टे  तोड़  दिये।।
भेद - भाव विष भरे घड़े  मोहन  ने उठकर फोड़ दिये। 
हिन्दू - यवन, हिन्द - हिन्दी,  चारों के जीवन जोड़ दिये।।
जागृत जीवन मिला, पाप से मुक्त मुक्ति का द्वार खुला। 
असहायों   के  लिये  अंत  में  असहयोग  आधार  हुआ।।


(1921 ई.)

Wednesday, October 14, 2020

समय और समाज का भाष्य : विजय विशाल की कविताएँ : शशि कुमार सिंह

                                                 




                                            

 




समय और समाज का भाष्य : विजय विशाल की कविताएँ

शशि कुमार सिंह 


चींटियाँ शोर नहीं करतीं  विजय विशाल का सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह है। यह सच है कि चींटियाँ शोर नहीं करतीं। पर यह अधूरा सच है। पूरा सच यह है कि अनेक ऐसे रचनाकार भी हैं जो बेहद ख़ामोशी से रचनारत रहते हैं।वे भी शोर नहीं करते। विजय विशाल ऐसे ही रचनाकार हैं जो शहरी चकाचौंध से दूर हिमाचल के पहाड़ी गाँव में मौन कवि-कर्म में विश्वास रखते हैं। इस संग्रह की कविताओं से गुजरना एक रोचक यात्रा की तरह है।इन कविताओं का वैविध्य विस्मित करता है। समय और समाज का शायद ही कोई पहलू हो जो इन कविताओं में न सिमट आया हो। यहाँ मज़दूर हैं। किसान हैं। शासक हैं। छात्र हैं।बेरोजगार हैं। स्त्रियां हैं। बुज़ुर्ग हैं। बच्चे हैं। पहाड़ हैं। पहाड़ के संघर्ष हैं। गाँव हैं। लोक संस्कृति है। शहरीकरण है। उसकी विकृतियाँ हैं। यानी यह संग्रह वर्तमान का विराट एलबम है।

इस संग्रह की कविताएं श्रम के सौंदर्य की कविताएं हैं। यहाँ श्रमिक हैं। उनके  श्रम की महत्ता है।  साथ ही उनका अस्थायित्व और शोषण भी। कवि को मजदूरों का श्रम चुरा लिए जाने की चिन्ता है। एक काम पूरा होते ही मज़दूरों को नए काम की तलाश में भटकना पड़ता है। लेकिन विजय विशाल  मज़दूरों की जिजीविषा की प्रशंसा करते हुए कहते हैं -

"न मधुमक्खियां हार मानती हैं

न मजदूर काम तलाशना छोड़ते हैं 

इनकी यह जिजीविषा ही बचाये रखती है

पृथ्वी पर सृजन की संभावनाओं को।" 

श्रम और श्रमिक के प्रतीक के रूप में विजय विशाल प्रकृति के बीच से ही उपमान चुनते हैं। मधुमक्खी के अलावा चींटी उन्हें निरन्तर श्रम करती तथा औरों को प्रेरित करती हुई जान पड़ती है। यह अकारण नहीं है कि पहली कविता में मधुमक्खी आती है और अंतिम में चींटी। मधुमक्खी और चींटी से मिलकर श्रम का ऐसा वितान निर्मित होता है जिसमें कर्म-श्रम की पूरी गाथा है। संग्रह के शीर्षक वाली कविता भी श्रम के सौंदर्य की कविता है। मौन श्रम की - 

''एक साथ एक जगह इकट्ठा होने पर भी चींटियाँ शोर नहीं करतीं 

न ज़ुबान से न क़दमों की थाप से 

चींटियाँ सिर्फ़ कर्म  करती हैं

अपनी पूरी लगन से।" 

कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ चींटियाँ श्रमिक हैं। मज़दूरों की एकता और तदुपरांत उनकी जीत में कवि को विश्वास है -

"आकार में छोटी चींटियों से 

डरते हैं विशालकाय हाथी भी 

हाथियों का चींटियों से यूँ डरना  

चींटियों की जीवन्तता का प्रमाण है।"

यह जिजीविषा और जीवंतता इस संग्रह में सर्वत्र विद्यमान है -

'यह भरोसा ही तो है

जिसके सहारे 

हर तबाही के बाद भी 

उठ खड़ा होता है आदमी।'

श्रम के प्रति रुझान की वजह से ही कवि सौंदर्य के प्रतिमानों पर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। 'बया का घोंसला' ऐसी ही कविता है। इसकी प्रारंभिक पंक्तियां पढ़कर मुक्तिबोध के संग्रह 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' की याद आ जाती है। कवि की दृष्टि में सुंदर इमारत 'बया का घोंसला' है क्योंकि वह श्रम से निर्मित है। उसमें विलासिता का अंश नहीं है। 'तुम /जो संसार की / सबसे सुंदर इमारतों की /  सूची बना रहे हो/ इसमें शामिल कर लो/ एक अदद घोंसला।' कवि की नज़र में बया का घोंसला/ जो किसी बुर्ज खलीफा से कम नहीं/न तकनीक में / न बुनावट में/ न कसावट में।' 

कवि यह स्पष्ट करता है कि श्रम की सार्थकता उसके परोपकार में ही निहित है -

"बया हमेशा के लिए  

काबिज़ नहीं रहती 

अपने इन घोंसलों पर

पंद्रह बीस दिन अंडे सेंक 

अपने नवजात बच्चों सहित हो जाती है फुर्र 

पीछे छोड़ देती है घोंसला 

किसी दूसरे पक्षी को जो बना न पाया हो अपना कोई ठौर।' 

यह श्रम का सौंदर्य विजय विशाल 'बूढ़ी औरतों' में भी देखते हैं जो घर के काम के अलावा 'उकड़ू बैठ निगोड़ती हैं खेत।'  विजय विशाल किसान को देखकर कह उठते हैं, "पचास वर्षों की /खेती से/उग आए/शब्दों के समूह/उसके झुर्रीदार चेहरे को/कवि/होने की पहचान/देने में समर्थ हैं।"

बेरोजगारी के प्रति चिन्ता भी इसी श्रम-सौंदर्य की अगली कड़ी है। इसीलिए ऐसी कविताओं में भी बार-बार बेरोजगार आते हैं जो मूलतः बेरोजगारी पर नहीं लिखी गयी हैं। कवि की संवेदनशीलता उसे बेरोजगारों की पीड़ा से असंपृक्त नहीं रहने देती। यह अकारण नहीं है कि 'हुक्के के पलायन' में भी वह कहता है, "गाँव में उपेक्षित हुक्का /किसी बेरोजगार युवक की तरह / महानगर को पलायन कर गया।" 'जब पगडंडी सड़क हुई' में कवि कहता है, "इस तरह बैल ज़मीन से बेदखल हुए/अब सड़कों पर आवारा फिरते हैं/ हज़ारों हज़ार बेरोजगारों की तरह।" 'पढ़ाई बनाम श्रम' में भी बेरोजगारी है। 

विजय विशाल पहाड़ के कवि हैं। गाँव में बसते हैं। इसलिए पहाड़ी जीवन की रीति- नीति और लोक संस्कृति उनकी कविताओं में व्यक्त होती है। धरती उनके लिए माँ है तो पहाड़ पिता। ऐसा पिता जो सदियों से अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहा है। यह आत्मीयता ज़मीन और स्थानीयता से जुड़ाव की परिचायक है। उन्हें पहाड़ी गाँवों में हुक्का याद आता है। कांसे की थाली में माँ के हाथ की बनी गर्मागर्म रोटी याद आती है। इसे सिर्फ़ 'नॉस्टेल्जिया' कहकर नहीं टाला जा सकता। यह एक संवेदनशील मन की पीड़ा है जो तेजी से हो रहे टूटन, विघटन और पलायन पर चिंतित है। गाँवों के विनाश की यह चिन्ता 'जब पगडण्डी सड़क हुई' में पूरे तीखेपन के साथ व्यक्त होती है। पगडण्डी का सड़क हो जाना महज रास्ते का चौड़ा होना भर नहीं है। यह विनाश का सूचक भी है। एक संस्कृति के लोप और दूसरी के उद्गम की प्रस्थान-यात्रा भी है। कवि कहता है, "जब पगडण्डी सड़क हुई/ पहले पेड़ गए/ फिर पत्थर और मिट्टी/ उनकी राह हो लिए और इस तरह पहाड़ हमेशा के लिए रीत गए।'' मगर कवि हार नहीं मानता है।वह विनाशक शक्तियों की शिनाख्त करता है।

विजय विशाल का काव्यात्मक साहस प्रशंसनीय है। वे सत्ता से टकराते हैं।उनके यहाँ अनेक राजनैतिक कविताएँ हैं। इन कविताओं का व्यंग्य नागार्जुन की तरह मारक भले न हो पर लक्ष्य स्पष्ट है। ''ऊँचे कगारों पर पहुँचे कई बौने लोग/घड़ी को रोककर/अपने पक्ष में बदलना चाहते हैं/समय।" यह काव्यांश क्या किसी व्याख्या की अपेक्षा रखता है? सत्ता के शीर्ष पर पहुँचे लोग कौन हैं? ये लोग इतिहास और राजनीति की मनमानी व्याख्या कर रहे हैं। वर्तमान राजनीति के मूल चरित्र पर इससे बड़ी और कड़ी टिप्पणी और क्या हो सकती है? आज कुछ ही कवि यह कहने का साहस जुटा पाते हैं - 

"टुकड़े टुकड़े गैंग कहकर

वे कर दिए गए बहिष्कृत

इस विचारहीन दुनिया में  

आसान नहीं होता शब्दों के नए अर्थ गढ़ना  

या 

पुरानी किताबों को नए दृष्टिकोण से पढ़ना।''

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि विजय विशाल ऐसे ही कवि हैं जो सत्ता से टकराते हुए इस विचारहीन दुनिया में प्रगतिशील और मानवतावादी विचारों के साथ हैं। आत्मविश्वास के साथ शब्दों के नए अर्थ गढ़ और पुरानी किताबों को नए दृष्टिकोण से पढ़ रहे हैं। यह अन्याय के विरुद्ध आम आदमी और सचाई के साथ खड़े होने का साहस है। यह साहस उन्हें अन्य कवियों से अलग करता है। तेज़ी से बढ़ रही असहिष्णुता और मॉब लिंचिंग पर कवि क्षुब्ध है। यह उनका साहस ही है कि वे 'सत्ताधीशों के नाम एक पत्र' लिखते हैं। 'अबकी दंगों के बाद' में भी यही साहस है।आम आदमी से जुड़ाव की वजह से ही विजय विशाल की कविताओं में यह ताक़त आ पाई है। 

वर्तमान का विरोधाभास है कि मनुष्य एक साथ कथित रूप से सभ्य और बर्बर दोनों होता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह अंधराष्ट्रवाद और युद्धोन्माद का माहौल तैयार किया गया है वह किसी भी सभ्य और संवेदनशील व्यक्ति को चिंतित करने के लिए पर्याप्त है। युद्धोन्माद के सहारे सत्ता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकती है।  उसे व्यापक तबाही की चिंता नहीं। सत्ता को चिन्ता नहीं कि युद्ध सभ्यताओं को लील जाता है। सुहाग उजाड़ देता है। बुजुर्गों से उनकी औलाद छीन लेता है। गोदी में खेलते हज़ारों बच्चे अनाथ हो जाते हैं। सैकड़ों विधवाएँ बेसहारा हो जाती हैं। कवि ऐसे हालात में भी 'आओ युद्ध करें' की चीख-पुकार करने वाली सत्ता को उन्मादी, शातिर और चालाक कहता है। इस उन्मादी माहौल में युद्ध के ख़िलाफ़ बयान देना भी देशद्रोह से कम नहीं है और शान्ति की बात कहना तो  धुर दुश्मनों के एजेंट होना है। ऐसी विकट परिस्थितियों में भी कवि अपनी प्रतिबद्धता दुहराता है -

"युद्ध के विरुद्ध 

मैं पहले भी था 

आज भी हूँ 

और कल भी रहूँगा। अपनी तमाम 

प्रतिरोधक क्षमता के साथ।" 

एक मानवतावादी और अपने कवि-कर्म के प्रति जिम्मेदारी अनुभव करने वाला कवि ही यह कह सकता है कि -

"इस पाषाण होते समय में  

मानुष के भीतर 

बचाये रखनी हैं

सम्वेदनाएँ 

उकेरनी हैं उनमें भावनाएं 

ताकि सृष्टि में 

जिंदा रखा जा सके सद्भाव 

ऐसे कठिन काम

पे जा चुके हैं कविता को।"  

और कवि इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि "प्रेम ही काव्य की आत्मा होगी।'' यह कहना काव्यशास्त्र के मानदंडों को भी चुनौती देना है जो रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि को काव्य की आत्मा घोषित कर चुके हैं। प्रेम विजय विशाल की कविता के केन्द्र में है।उनके लिए जीवन और प्रेम एक दूसरे के पर्याय हैं। वे कहते हैं, ''जहाँ जीवन है/ वहाँ प्रेम है/ जहाँ प्रेम है/ वहाँ कविता है/ प्रेम के बिना/ न जीवन है /न कविता है।'' इस तरह एक मानवतावादी कवि की कविता की घोषणा प्रेम है। प्रेम में इसी विश्वास की वजह से कवि कहता है कि ''जो भीतर तक /नफ़रत से भरा है / हद है/अपने को/ कवि कह रहा है।" कवि का विश्वास है कि ''जहाँ कविता होती है /वहाँ नफ़रत नहीं होती।"


'कविता' पर इस संग्रह में कई कविताएँ हैं। ये कविताएँ कवि की काव्य दृष्टि और प्राथमिकता की सूचक हैं। देखना दिलचस्प है कि कवि कैसी कविताओं को अमर और दीर्घायु कहता है। नफ़रत के बीच जीते हुए प्रेम की कविता, अविश्वास के माहौल में विश्वास और मित्रता की कविता, उजड़ते वनों के बीच प्रकृति की कविता, सत्ताधीशों के ज़ुल्म को सहते हुए सत्ता को चुनौती देने वाली कविता और बर्बरता के विरुद्ध कविता अमर और दीर्घायु होती है। यह दृष्टि कविता की जनपक्षधरता से निर्मित होती है। जनपक्षधर कविताएँ अमर होंगी ही। कवि की कविताओं में प्राण इसी जनपक्षधरता, मनुष्य की अदम्य जिजीविषा और सत्ता को चुनौती देने वाली चेतना से आती है। इसके विपरीत उन कवियों और कविता की लानत-मलामत भी है जो ''निहत्थों के विरुद्ध खड़े होते हैं/बर्बरों के साथ/ निज़ाम के ढहने /और कवि के मरने के साथ ही/मर जाती हैं वे कविताएँ जो शोषितों के ख़िलाफ़/ शोषकों के पक्ष में लिखी गई होती हैं।" संग्रह की कविताओं में कठिन समय में परिवर्तन की चाह है। यहाँ विद्रोह की चेतना है। कवि को सर्वहारा में विश्वास है और वह परिवर्तन के प्रति आश्वस्त है। लेकिन कवि यह भी भली-भांति जानता है कि सिर्फ 'शासक बदलने से /व्यवस्था नहीं बदलती।'

संग्रह की कविताएँ अपने समय से संपृक्त हैं। इसलिए यहाँ कोरोना महामारी पर भी कई कविताएँ हैं। उसके तमाम सकारात्मक और नकारात्मक पहलू उनकी कविता में आये हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है मनुष्य की जिजीविषा जो इस संग्रह में रक्त- मज्जा की तरह है। 'इतिहास गवाह है /अंततः महामारी ही पराजित हुई है/मनुष्य के पराक्रम के आगे।'

चींटियाँ शोर नहीं करतीं की कविताएँ मनुष्यता के महत्व की कविताएँ भी हैं। आज के बाज़ारवादी समय में व्यक्ति रिश्तों से दूर होता जा रहा है। रिश्ते निभाना मनुष्य होना है।कवि कहता है मैं 'जड़ें होना चाहता हूँ/ ताकि पकड़ सकूँ रिश्तों को/सींच सकूँ मनुष्यता को।' 'मन का पीपल हो जाना' भी 'मनुष्य होने के सुख' की कविता है। ये कविताएँ मनुष्यता के साथ उम्मीद की कविताएँ भी हैं।

कलात्मकता की खोज करने वाले पाठक इस संग्रह से थोड़े निराश भी हो सकते हैं। सीधे सरल शब्दों में कवि ने अपनी बात कही है। यह सादगी ही इस संग्रह की पहचान है। कवि का ध्यान कथ्य पर अधिक रहा है। कथ्य की ताज़गी और शिल्प की सादगी इस संग्रह का वैशिष्ट्य है।


प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन प्रा.लि.

मूल्य: 170₹

___________________________________


शशि कुमार सिंह, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, महात्मा गाँधी गवर्नमेंट कॉलेज, मायाबंदर, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह

संपर्क : +91 95318 34834